छात्र आंदोलन की रचनात्मकता: जेन ज़ी के सत्याग्रही
20 जुलाई देश को ठीक करने की शुरुआत है, जो देश सालों के डर और नफ़रत से विखंडित हो गया था. मुझे पूरा भरोसा है कि डर का क़िला टूट गया है और अब उसमें दरारें पड़ेंगी और वह बिखर जाएगा. धर्म, जाति, वर्ग, भाषा और संस्कृति की सीमाओं से ऊपर उठकर युवाओं ने लोकतंत्र की भावना को एक बार फिर जीवंत किया है. सोशल मीडिया के दौर में उभरे ये युवा मानो ‘इंस्टाग्राम जेनरेशन के सत्याग्रही’ थे|
20 जुलाई के बाद भारत अब वैसा नहीं रहेगा जैसा पहले था. एक ऐसे देश में कुछ हलचल हुई, कुछ बदलाव आया जो बहुत समय से डर और नफ़रत से तबाह हो रहा था. हमने देखा कि इस बिखरे हुए देश के फिर से जुड़ने की शुरुआत हुई. और यह इसलिए मुमकिन हो पाया कि देश भर के लाखों युवा उठ खड़े हुए- ऐसे युवा जो अलग-अलग धर्म, जाति, वर्ग, भाषा और संस्कृति से थे. वे इंस्टाग्राम जेनरेशन के सत्याग्रही थे|
20 जुलाई का संसद मार्च
20 जुलाई की सुबह प्रदर्शनकारी छात्रों ने जंतर-मंतर से राष्ट्रीय संसद भवन तक मार्च करने का ऐलान किया था. मैं सुबह जल्दी ही प्रदर्शन स्थल पर पहुंच गया. पिछली रात से ही बड़ी संख्या में युवा वहां जुटने लगे थे. युवाओं को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने की पुलिस की सारी कोशिशें नाकाम रहीं: जैसे कि सड़क पर अवरोध खड़े करना, मेट्रो स्टेशन बंद करना, इंटरनेट बंद करना और भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस व पैरामिलिट्री जवानों की तैनाती करना|
आयोजकों और सुरक्षा एजेंसियों की उम्मीदों से कहीं ज़्यादा भीड़ जमा हो गई थी. जब कुछ नेताओं ने अपनी सुरक्षा की चिंता करते हुए संसद तक मार्च न करने की सलाह दी तो जमा हुई भीड़ बेचैन हो गई. लेकिन युवाओं का इरादा पक्का था. वे लगातार ‘संसद, संसद, संसद’ की आवाज़ बुलंद करते जा रहे थे|
अब इस मार्च को रोका नहीं जा सकता था. और जब मैं युवाओं के इस विशाल जनसमूह के बीच चल रहा था, तो मुझे इस बात का शिद्दत से एहसास हुआ कि मैं इतिहास बनते हुए देख रहा हूं|
मैं सबसे पहले भीड़ की विविधता देखकर प्रभावित हुआ, जिसकी औसत उम्र 20 साल थी. यहां युवा भारत के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व था. हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, दलित, आदिवासी, हर जाति, भाषा और पहचान के लोग, पुरुष, महिलाएं और अन्य लिंग के लोग, अमीर, मध्य वर्ग और श्रमिक वर्ग. यहां तक कि सांकेतिक भाषा में बात करने वाला एक उत्साहित समूह भी था|
एक युवा व्यक्ति, जिसके साथ मैं कुछ दूर तक चला, उसने मुझसे पूछा, ‘क्या आपने अपनी इतनी लंबी ज़िंदगी में कभी हमारे जैसे बड़े जन-आंदोलन का अनुभव किया है?’ युवा लोग इस बात को लेकर बहुत जागरूक थे- भले ही वे इसे साफ़ तौर पर कह न पाते हों- कि वे जो करने जा रहे थे, वह कितना ख़ास और महत्वपूर्ण था|
असल में बिना किसी नेता वाली उस भीड़ में अनुशासन और एक मक़सद की भावना साफ़ दिख रही थी. वॉलंटियर्स सामने आए. उन्होंने ख़ुद को व्यवस्थित किया. मैंने सुना कि वे एक-दूसरे को अहिंसा और शांति बनाए रखने के महत्व के बारे में बता रहे थे|
छात्रों पर पुलिस का हमला
और फिर पुलिस ने अपना असली चेहरा दिखाया और मार्च कर रहे छात्रों की भीड़ पर टूट पड़ी. उनके पास लाठियां थीं- जिनमें से कुछ में कीलें और इलेक्ट्रिक शॉक देने वाले उपकरण लगे हुए थे जिससे मारक क्षमता बढ़ गई थी- साथ ही आंसू गैस के गोले और पैलेट गन भी थीं. उन्होंने छात्रों पर बेरहमी से हमला किया. पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिलाओं पर भी हमला किया. उनके कपड़े फाड़ दिए और उनके शरीर को ग़लत तरीक़े से छुआ|
ज़ाहिर है, इन युवाओं ने अपनी ज़िंदगी में कभी भी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया था. लेकिन उनकी सूझ-बूझ और हिम्मत कमाल की थी. उन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर आस-पास मौजूद लोगों की सुरक्षा के लिए हाथ बढ़ाया. इनमें से कई लोग एक-दूसरे के लिए अजनबी थे. उस पल में उनका धर्म, जाति, वर्ग, लिंग या भाषा- इनमें से किसी भी चीज़ का कोई महत्व नहीं था. मायने यह रखता था कि वे सब इस स्थिति में एक साथ थे. पुरुषों ने महिलाओं की, तो महिलाओं ने पुरुषों की रक्षा की|
पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी. छात्रों को बदनाम करने के लिए पत्थर फेंके गए. यहां तक कि पेलेट गन से भी फ़ायरिंग की गई, जिससे विरोध कर रहे छात्र अंधे हो सकते थे|
नई दिल्ली के संसद मार्ग पर 20 जुलाई 2026 को आयोजित विरोध मार्च के दौरान नारे लगाते कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थकों को रोकते सुरक्षा बल के जवान. (फोटो: पीटीआई)
विरोध-उत्सव के ज़रिए पलटवार
पुलिस ने देश के बच्चों के साथ जिस बेरहमी से बर्ताव किया, उसने देश की अंतरात्मा को झकझोरकर रख दिया. अगली शाम मैंने प्रदर्शनस्थल तक जाने का फ़ैसला किया. यह उन घायल युवाओं के प्रति एकजुटता दिखाने की मेरी एक छोटी-सी व्यक्तिगत कोशिश थी, जिनके बारे में मुझे लग रहा था कि वे निराश और डरे हुए होंगे|
लेकिन जब मैं और मेरी पत्नी जंतर-मंतर पहुंचे, तो वहां का नज़ारा देखकर हम हैरान हुए और उत्साहित भी. वहां के माहौल में बिल्कुल भी उदासी नहीं था. वह तो निडर विरोध का एक उत्सव जैसा था. सरकार ठीक से युवाओं के हौसले का अंदाज़ा नहीं लगा पाई. पुलिस की हिंसा ने उनके हौसलों को और भी मज़बूत कर दिया था. जिन छात्रों को पुलिस ने पीटा था, वे पट्टी बंधवाकर वापस प्रदर्शनस्थल पर आ गए थे. हज़ारों दूसरे लोग उनके साथ जुड़ गए थे. और उनका सारा ग़ुस्सा एक ही व्यक्ति पर केंद्रित हो गया था- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी|
उन्होंने प्रधानमंत्री का उपहास करते हुए रचनात्मक व्यंग्य के ज़रिए अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया. कई लोगों के हाथों में ऐसे पोस्टर थे जिसमें मुंह में ‘मेलोडी’ चॉकलेट दबाकर पोज़ वाली तस्वीरें थीं. यह उस तोहफ़े का मज़ाक़ था जो उन्होंने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को ‘मेलोडी’ टॉफी के रूप में दिया था|
एक पोस्टर पर लिखा था, ‘बुरे दिन ही अच्छे थे’. यानी, जिन ‘अच्छे दिनों’ का वादा किया गया था उनसे कहीं बेहतर तो वे ‘बुरे दिन’ ही थे. एक और पोस्टर पर लिखा था, ‘लोकतंत्र हा हा हा’. साथ ही यह भी, ‘वे हमें दबाने की कोशिश करते हैं, उन्हें नहीं पता कि हम बीज हैं.’
एक पोस्टर में मोदी और उनकी कैबिनेट के मंत्रियों तो ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना की वर्दी पहने हुए दिखाया गया था, जिस पर लिखा था ‘हमारे ज़माने की ईस्ट इंडिया कंपनी’. एक पोस्टर का शीर्षक था ‘मोदी के 5 सबसे अच्छे कामों की सूची’, जिसके बाद एक ख़ाली पन्ना था. एक और पोस्टर में एक कंकाल दिखाया गया था जिस पर लिखा था: ‘ऐसी सरकारी परीक्षाओं का इंतज़ार जो लीक न हों.’ और एक मज़ेदार पोस्टर था, ‘एक कॉकरोच की स्वाभिमानी मां.’
कई पोस्टरों में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और मंदिर ट्रस्ट के अधिकारियों द्वारा किए गए बड़े घोटाले का मज़ाक़ उड़ाया गया था. एक पोस्टर में यह दिखाया गया कि मोदी भगवान राम से गुहार लगा रहे हैं कि वे उन्हें बचा लें. राम जवाब देते हैं, ‘पहले मेरे पैसे लौटाओ!’ एक और पोस्टर में एक युवक यह बताने की कोशिश कर रहा था कि मोदी के दौर में उसके हालात कितने बदतर हो गए हैं. एक प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से पहले वह अपने स्कूटर से मंदिर गया और नक़द चढ़ावा चढ़ाया. लेकिन पेपर लीक हो गया, सरकार ने उसके स्कूटर के पेट्रोल में इथेनॉल मिला दिया, और मंदिर में दान किए गए पैसे मंदिर के पुजारी ने चुरा लिए!
कई प्रदर्शनकारियों ने उस बेतुके दावे का मज़ाक़ भी उड़ाया कि इस विरोध-प्रदर्शन को पाकिस्तान, चीन और हमेशा चर्चा में रहने वाले जॉर्ज सोरोस से फ़ंडिंग मिल रही थी. एक नौजवान ने मंच से घोषणा की कि उसे सच में फ़ंडिंग मिली है. पाकिस्तान ने हॉस्टल से आने का बस का किराया दिया था और चीन ने मेट्रो का किराया. उसे उम्मीद थी कि शायद नेपाल वापसी का किराया देगा!
मुझे ग़ुस्से से भरे हुए एक नौजवान का पोस्टर बहुत पसंद आया. उस पर लिखा था: ‘मुझे कोई फ़ंडिंग नहीं देता. मैं इस भ्रष्ट सरकार से मुफ़्त में नफ़रत करता हूं!’
और इस मौक़े के लिए बनाए गए गानों, डांस और जोश भरे नारों की धूम मच गई. उमस भरी रात में ये आवाज़ें आसमान में गूंज रही थीं, जो बिना किसी जवाबदेही वाली सत्ता के घमंड को चुनौती दे रही थीं|
यह विरोध स्थल जल्द ही आपसी सेवा और मदद का केंद्र बन गया. ठीक वैसे ही जैसे 2020-21 में दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीने तक चले किसान आंदोलन के दौरान हुआ था. हर तरफ़, नौजवान मुस्कुराते हुए लोगों से खाने के पैकेट, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक्स और पानी की बोतलें लेने का आग्रह करते दिख रहे थे. युवा डॉक्टर स्वेच्छा से ज़ख़्मों की मरहम-पट्टी करने या गर्मी से बेहाल होकर गिरे प्रदर्शनकारियों की मदद करने के लिए आगे आए. नौजवानों का एक और समूह कचरा उठाने का काम कर रहा था. वॉलंटियर्स भीड़ को व्यवस्थित कर रहे थे.
यहां कुछ मज़ेदार पल भी देखने को मिले. एक नौजवान ने हमें केला लेने के लिए कहा. जब हमने विनम्रता से मना किया, तो उसने कहा, ‘आप मना नहीं कर सकते. यह मोदी की तेहरवीं का प्रसाद है!’
देश भर से लोगों ने फूड डिलीवरी ऐप्स के ज़रिए जंतर-मंतर पर जमा प्रदर्शनकारियों के लिए खाना भिजवाया. मुझे संदीप अध्वर्यु का एक कार्टून बहुत पसंद आया जिसमें पुलिस एक डिलीवरी करने वाले से पूछताछ कर रही है. उससे पूछा जाता है कि यह ऑर्डर किसने दिया? जवाब मिलता है- भारत. इसे कहां पहुंचाना है? जवाब- लोकतंत्र. अगला सवाल होता है- इसके पैसे कौन दे रहा है? डिलीवरी करने वाला जवाब देता है- उम्मीद.
गुरुद्वारों ने भी खाने का इंतज़ाम किया. गुरुद्वारों व मस्जिदों ने उन नौजवानों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए जो विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दूर-दूर से आए थे और जो घायल हो गए थे|
इस बीच, पुलिस ने ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया दी जैसी वह हमेशा देती है. उन्होंने नौजवानों को बिना किसी वजह के उठाना शुरू कर दिया- किसी-किसी को तो ऑटो-रिक्शा से खींच लिया गया- और उन्हें थानों में हिरासत में रखा गया, साथ ही धमकी दी गई कि उनका करिअर बर्बाद कर दिया जाएगा|
हमारे युवा वकील कई रातों तक जागते रहे ताकि उन युवा लोगों को छुड़ा सकें- जिनमें से कुछ तो सिर्फ़ 18 साल के थे और डरे हुए थे कि अगर उनके माता-पिता को पता चला तो वे क्या करेंगे. होटलों और ढाबों को चेतावनी दी गई कि वे प्रदर्शनस्थल पर खाने की डिलीवरी न करें. गुरुद्वारों और मस्जिदों को निर्देश दिया गया कि वे विरोध कर रहे छात्रों के लिए अपने दरवाज़े न खोलें. दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईटी और देश भर के अन्य शिक्षण संस्थानों ने छात्रों के लिए चेतावनी जारी की कि वे विरोध प्रदर्शनों में शामिल न हों|
लेकिन किसी भी चीज़ का कोई असर नहीं हुआ. युवा और छात्र प्रदर्शन स्थल पर लगातार जमा होते रहे- अपने मज़ेदार और बेबाक पोस्टरों, अजनबियों के साथ दोस्ती, खाने-पीने की चीज़ें बांटने, नारों, नाच-गाने और जोश के साथ|
20 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हिरासत में लेती पुलिस
पुलिस की परवाह नहीं
दिल्ली में शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन तेज़ी से देश भर के शहरों में फैल गया. एक दोस्त ने उन शहरों की लिस्ट बनानी शुरू की जहां यह विरोध प्रदर्शन रातों-रात शुरू हो गया था. उसने अपनी लिस्ट में शहरों का नाम दर्ज करना शुरू किया: कुरुक्षेत्र, चंडीगढ़, जम्मू, धर्मशाला, जयपुर, जोधपुर, लखनऊ, प्रयागराज, उन्नाव, रामपुर, भोपाल, इंदौर, अहमदाबाद, सूरत, मुंबई, पुणे, पटना, बिलासपुर, रायपुर, इंदौर, कोलकाता, जादवपुर, बैंगलोर, दावणगेरे, कलबुर्गी, गुवाहाटी, आइजोल, ईटानगर, शिलांग, अगरतला, हैदराबाद, विशाखापत्तनम, विजयनगरम, राजमुंदरी, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम. और फिर उसने हार मान ली. लिस्ट हर घंटे बढ़ती जा रही थी|
पुलिस द्वारा डराने-धमकाने की कोशिशें और उनका सामना करने का अंदाज़ मज़ेदार और बेबाक था. युवा लड़कियां प्रदर्शनस्थल के आस-पास खड़े पुलिसवालों के पास जातीं और पूछतीं, ‘अंकल जी, ज़रा बताइए कि आप हमें अगली बार कब पीटने वाले हैं. देखिए, तब मैं जूते पहनकर आऊंगी, क्योंकि पिछली बार भगदड़ में मेरी चप्पलें खो गई थीं!’
कई युवा लड़के पोस्टर दिखाते हुए कहते, ‘पुलिस, आपने अभी तक हमें पीटा क्यों नहीं?’ बिहार में एक प्रदर्शनकारी ने पुलिस की टुकड़ी से पूछा, ‘अंकल, आपने अभी तक आंसू गैस का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? मैं इसका अनुभव करना चाहता हूं.’
जब पटना में पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया, तो वे बारिश में नाचने लगे| और एक बहुत मज़ेदार वीडियो भी है जिसमें प्रदर्शनकारियों से भरी पुलिस बस एक ट्रैफ़िक लाइट पर रुकती है. एक युवा चुपके से पीछे जाकर दरवाज़ा खोलता है और छात्र आज़ाद होकर बाहर भाग जाते हैं|
इसमें हिम्मत और शरारत तो थी ही, लेकिन असली बहादुरी भी थी. मुंबई में एक महिला ने प्रदर्शनकारियों से भरी बस देखी और बस के सामने जाकर अपने हाथ फैला दिए, जैसे इशारा कर रही हो कि वह बस को आगे नहीं बढ़ने देगी. वहां से गुज़र रहे कई लोगों ने उसका हौसला बढ़ाया और वे भी उसके साथ हो लिए. बस आगे नहीं बढ़ पाई|
देश भर की सड़कों पर युवा इतनी बड़ी संख्या में क्यों जमा हुए?
इन सबके बीच, सैकड़ों लोगों ने रील्स बनाईं और पोस्टर बनाए ताकि वे बता सकें कि वे इस विरोध प्रदर्शन में क्यों शामिल हुए हैं|
एक पोस्टर पर लिखा था- ‘अब बात सिर्फ़ शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की नहीं है. हमारी चिंता है कि लोकतंत्र बचा रहे.’
यह साफ़ था कि यह विरोध प्रदर्शन अब सिर्फ़ शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग तक सीमित नहीं रह गया था, जो परीक्षा के पेपर लीक को रोकने में नाकाम रहे. युवा इसलिए विरोध कर रहे थे क्योंकि उन्हें अपना कोई भविष्य नहीं दिख रहा था और सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं थी|
एक लाख से ज़्यादा सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए. जो स्कूल बचे, उन्हें सबसे ज़रूरी संसाधन भी नहीं मिल पाए. ये स्कूल भारत के सबसे ग़रीब परिवारों के बच्चों के लिए थे. शिक्षा का बजट पहले से ही कम था, और अब उसमें और भी ज़्यादा कमी कर दी गई. कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया की बेहतरीन विश्वविद्यालयों की लिस्ट में जगह नहीं बना पाई. शिक्षकों की भर्ती उनके अकादमिक क़ाबिलियत के बजाय किसी ख़ास विचारधारा को मानने के आधार पर की गई. विश्वविद्यालय औसत दर्जे की सोच और घुटन वाली जगहें बन गई थीं|
इससे भी बुरी बात यह हुई कि नौकरियां नहीं थीं. कुछ ही लोगों के हाथों में बेहिसाब दौलत जमा हो गई- जिन्हें सत्ता में बैठे लोगों का क़रीबी माना जाता था- लेकिन इस तरह के विकास से लाखों लोगों के लिए अच्छे काम के मौक़े नहीं बन पाए|
18 या 20 साल के युवा ने सिर्फ़ मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ही देखी है. हो सकता है कि सड़कों पर उतरे लोगों में से बहुत से लोग पहले भाजपा के समर्थक रहे हों. हाल के राष्ट्रीय चुनावों में कम से कम 40% युवाओं ने भाजपा को वोट दिया था. अगर हम लगभग 20% अल्पसंख्यक युवाओं को छोड़ दें, तो देश के आधे से ज़्यादा युवा हिंदुओं ने भाजपा को वोट दिया था|
प्रदर्शन स्थल पर एक युवा ने अपनी पट्टी बंधी तर्जनी उंगली दिखाते हुए कहा, ‘अच्छा हुआ कि पुलिस ने मेरी यह उंगली तोड़ दी. क्योंकि इसी उंगली से तो पिछले चुनावों में कमल वाले बटन को दबाया था!’ इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि उनके माता-पिता इस विचारधारा के प्रति समर्पित होंगे|
युवाओं के मन में लंबे समय से मुसलमानों के प्रति नफ़रत भरी गई है. हो सकता है कि उनमें से कुछ ने इसे मान भी लिया हो|
लेकिन विरोध प्रदर्शनों में उनकी भागीदारी का मतलब था कि उन्होंने हिंदू-मुसलमान के विभाजन को किनारे कर दिया था, और कुछ ने तो शायद इसे पूरी तरह नकार भी दिया था. वे सरकार से कह रहे थे- काम पर लगो. हमारी ज़िंदगी बेहतर बनाओ. हमारी शिक्षा व्यवस्था को ठीक करो. अर्थव्यवस्था की ऐसे रूपरेखा बनाओ जिससे लाखों लोगों को नौकरी मिल सके|
ये विरोध प्रदर्शन का दायरा इससे भी आगे बढ़ गया था. यह सिर्फ़ उस सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत नहीं थी जिसे वे लापरवाह और भ्रष्ट मानते थे|
जब युवा महिलाएं आवाज़ उठा रही थीं, नारे लगा रही थीं, मोदी का मज़ाक़ उड़ाने वाले पोस्टर दिखा रही थीं, पुलिस को चुनौती दे रही थीं और पुरुष प्रदर्शनकारियों के साथ देर रात तक नाच रही थीं, तो वे पितृसत्ता, अपने माता-पिता और बुज़ुर्गों, अपने ‘वॉट्सऐप अंकल’ और उन पाबंदियों व कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ भी बग़ावत कर रही थीं जो उनकी ज़िंदगी का दम घोंटते हैं|
क्या इंस्टाग्राम के दौर में छात्रों के आंदोलन को सत्याग्रह कहना सही है?
मेरा मानना है कि हां, यह सही है.
किसी अन्यायपूर्ण सरकार के ख़िलाफ़ सत्याग्रह की दो ज़रूरी बातें होती हैं, जो हमें मोहनदास करमचंद गांधी ने सिखाई थीं. पहली है हिम्मत, जो इस आंदोलन में भरपूर दिखी. पुलिस की मार खाने के बाद भी छात्र विरोध-स्थल पर लौट आए. दोबारा पीटे जाने के बावजूद उनका इरादा पक्का था कि वे आंदोलन जारी रखेंगे| और दूसरी बात है अहिंसा. मेरे लिए यह इस विरोध की एक बहुत ही शानदार बात थी. जब पुलिस ने छात्रों को लाठियों से पीटा, तो उन्होंने पलटकर वार नहीं किया. मुझे एक नौजवान की तस्वीर याद है जो उस पुलिसकर्मी के सामने घुटनों के बल बैठ गया था जो उसे लाठी से पीट रहा था. उस नौजवान के हाथ जुड़े हुए थे और सिर झुका हुआ था, मानो वह उसे और पीटने के लिए कह रहा हो|
यह देखकर मेरे मन में गांधी के नेतृत्व वाले सत्याग्रहों की यादें ताज़ा हो गईं. सत्याग्रहियों की क़तारें पुलिस के सामने जाती थीं, उन्हें पीटा जाता था, लेकिन वे कभी भी पुलिसवालों पर हाथ नहीं उठाते थे और न ही भागते थे. और जो लोग पीटे जाते थे, उनकी जगह लेने के लिए और लोग आ जाते थे. मैंने सरकार के प्रति बहुत ग़ुस्सा देखा और उनके मन में धोखे का गहरा अहसास भी पाया. लेकिन किसी के मन में नफ़रत नहीं थी|
विरोध का जो तरीक़ा युवाओं ने अपनाया वह उनका अपना ईजाद किया तरीक़ा था- मीम्स, बेबाकी, व्यंग्य, हंसी-मज़ाक़, रील्स, गाने और डांस के ज़रिए विरोध. यह पिछली पीढ़ियों के सत्याग्रह और विरोध आंदोलनों के गंभीर और वैचारिक माहौल से बिल्कुल अलग था. फिर भी, इसमें वही हिम्मत थी और नफ़रत कहीं नहीं|
डर के क़िले का टूटना
मैंने इस लेख की शुरुआत में कहा था कि 20 जुलाई के बाद से भारत बदल गया है. किस तरह से? क्या भारत डर और नफ़रत से भरा हुआ गणतंत्र नहीं रहा जो वह बन गया था?
एक बदलाव ऐसा है जिसे नकारा नहीं जा सकता- और मुझे उम्मीद है कि इसका असर लंबे समय तक बना रहेगा- और वह है डर का ख़त्म होना. युवा लोग नरेंद्र मोदी को ललकार रहे हैं, उन्हें चुनौती दे रहे हैं और यहां तक कि अपशब्द भी कह रहे हैं, और वे ऐसा खुलेआम कर रहे हैं, अपना चेहरा दिखाकर. 20 जुलाई से पहले ऐसा सोचना भी नामुमकिन लगता था. तब इसके नतीजे के बारे में सोचकर ही डर लगता. उनके माता-पिता, शिक्षक और दोस्त उन्हें रोकते-टोकते. वे ख़ुद भी ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते.
लेकिन अचानक ही मिस्टर मोदी का क़िला उतना अभेद्य नहीं लग रहा है. अचानक मोदी उनके लिए उस सरकारी सत्ता का प्रतीक बन गए हैं जिसने उन्हें बुरी तरह निराश किया है. अचानक उन्हें मोदी कमज़ोर और हंसी के पात्र भी लगने लगे हैं|
क्या भारत के युवाओं ने नफ़रत की राजनीति को पीछे छोड़ दिया है?
मगर, क्या भारत ने मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों को उत्पीड़न, हिंसा और निष्कासन का शिकार बनाने वाले नफ़रत के एजेंडे को पीछे छोड़ दिया है? इस बारे में मुझे पक्का यक़ीन नहीं है|
सोशल मीडिया पर आए दो संदेशों ने मुझे सचमुच बहुत आहत किया. एक मैसेज एक ऐसे नौजवान के लिए था जो नाम से मुस्लिम लग रहा था और जो अपने दूसरे दोस्तों के साथ रोज़ा रख रहा था. मैसेज में लिखा था, मत कर, मत कर मेरे छोटे भाई. बाक़ी सब बच जाएंगे, पर तेरी ज़िंदगी बर्बाद कर देंगे|
कई नौजवान मुस्लिम दोस्तों ने कहा कि वे प्रदर्शन में शामिल होना चाहते थे लेकिन इसी डर से पीछे हट गए. उनका डर बेबुनियाद नहीं था. मेरे नौजवान वकील साथियों ने जामिया के बहुत से छात्रों को छुड़ाने के लिए निज़ामुद्दीन पुलिस स्टेशन में बिना सोए रातें बिताईं, जिन्हें पुलिस ख़ास तौर पर निशाना बना रही थी|
विरोध प्रदर्शन के शुरुआती दिन से ही जुनैद नाम के एक युवा ने – जो सिर पर टोपी और सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने हुए था और जिसकी मुस्लिम पहचान साफ़ दिख रही थी – प्रदर्शनकारियों को मुफ़्त में पानी, चाय और स्नैक्स देने के लिए एक स्टॉल लगाया. उसने विरोध प्रदर्शन की समाप्ति तक पूरे 34 दिनों तक यह काम जारी रखा|
लेकिन जिस शाम शिक्षा मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया और प्रदर्शनकारियों की जीत के साथ विरोध प्रदर्शन ख़त्म हुआ, उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसके पिता और उसकी बहन के ससुर को हिरासत में ले लिया और धमकी दी कि जब तक जुनैद पुलिस के सामने सरेंडर नहीं करेगा, तब तक उन्हें रिहा नहीं किया जाएगा. एक ज़बरदस्त पोस्टर सामने आया- ‘जब-जब मोदी डरता है, एक जुनैद गिरफ़्तार होता है.’
एक और संदेश जिसने मुझे बहुत दुखी किया, उसमें लिखा था- ‘इसे याद रखना. तुम्हारे माता-पिता तुम्हें जितना प्यार करते हैं, उससे कहीं ज़्यादा वे मुसलमानों से नफ़रत करते हैं. इसे याद रखना.’
जब वे युवा- जिन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद सही मायनों में कामयाबी हासिल की है – अपने घरों, अपने माता-पिता, अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और अपने पुराने सोशल मीडिया फ़ीड्स पर लौटेंगे, तो क्या वे इसे याद रखेंगे? क्या वे अगली बार नफ़रत और पूर्वाग्रहों के ख़िलाफ़ खड़े होंगे – जब ये बातें मुसलमानों के ख़िलाफ़ उनके घरों के लिविंग रूम, क्लासरूम, काम की जगहों या इंस्टाग्राम फ़ीड्स पर कही जाएंगी?
हमें यह याद रखना चाहिए कि छात्रों और युवाओं का यह कोई पहला विरोध प्रदर्शन नहीं है. इससे पहले भी ऐसा ही एक और साहसी विरोध प्रदर्शन हुआ था. दिसंबर 2019 में, मुस्लिम और वामपंथी विचारधारा वाले छात्रों ने भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी. उस समय, पुलिस ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में छात्रों की पिटाई की और उन्हें जेल में डाल दिया|
साथ ही, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हॉस्टल के कमरों में ऐसे ‘स्टन ग्रेनेड’ फेंके गए, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर आतंकवादियों के खिलाफ़ किया जाता है. जिन छात्रों ने उस विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, उन्हें बिना किसी मुक़दमे के कई सालों तक जेल में रखा गया. उमर ख़ालिद और शरजील इमाम आज भी छह साल से जेल में बंद हैं, जबकि किसी भी अदालत ने उन्हें उन अपराधों का दोषी नहीं ठहराया है जिनके आरोप उन पर लगे हैं|
कुछ सवाल अभी भी बिना जवाब के हवा में तैर रहे हैं. सरकार ने विरोध कर रहे छात्रों के साथ बातचीत क्यों नहीं की, जैसा कि 2026 में किया गया? उन्होंने भारत के युवाओं को यह भरोसा क्यों नहीं दिलाया कि विरोध करने के कारण किसी भी छात्र को निशाना नहीं बनाया जाएगा?
ये ज़ख़्म बहुत गहरे हैं, और अब तक मुस्लिम पहचान वाले जिन छात्रों को निशाना बनाया गया है, वे ख़ुद को बहुत अकेला महसूस करते रहे हैं. क्या अब यह बदलेगा?
मैंने शुरू में कहा कि 20 जुलाई देश को ठीक करने की शुरुआत है, जो देश सालों के डर और नफ़रत से विखंडित हो गया था. मुझे पूरा भरोसा है कि डर का क़िला टूट गया है और अब उसमें दरारें पड़ेंगी और वह बिखर जाएगा|
लेकिन क्या नफ़रत के क़िले में भी वैसी ही दरारें पड़ेंगी?
एक युवा मुस्लिम व्यक्ति हाथ में पोस्टर लिए खड़ा था, जिसमें मुसलमानों को अक्सर कही जाने वाली बात- ‘पाकिस्तान चले जाओ’- को चुनौती दी गई थी. वह पूछता है- ‘मैं पाकिस्तान क्यों जाऊं? यह मेरा घर है. मैं अपने देश से इतना प्यार करता हूं कि यह मान सकूं कि यह बिखरा हुआ है. मैं नहीं जा रहा हूं. मैं इसे ठीक करने के लिए यहीं रहूंगा.’ मुझे उम्मीद है कि इस बार वह युवा ख़ुद को अकेला महसूस नहीं करेगा|(हर्ष मंदर शांति और न्याय के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता और लेखक हैं.)
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









