नोएडा श्रमिक आंदोलन: ‘साज़िश’ की कहानी वाली चार्जशीट में पुलिस के अपने ही दावों में विरोधाभास
उत्तर प्रदेश पुलिस ने नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन को ‘साज़िश’ बताते हुए सैकड़ों गिरफ़्तारियां की हैं. अब उसकी चार एफआईआर में दाखिल चार्जशीटों में गिरफ़्तारी की तारीख, आरोपियों की उपस्थिति, मोबाइल लोकेशन, गवाहों के बयान और कथित भड़काऊ भाषणों को लेकर कई विरोधाभास सामने आए हैं, जो जांच पर सवाल उठाते हैं. पुलिस ने भगत सिंह पर लिखी किताब का इस्तेमाल भी आरोपियों की विचारधारा को संदिग्ध बताने के लिए किया है|

नई दिल्ली: अप्रैल के महीने में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन को उत्तर प्रदेश पुलिस एक सुनियोजित साजिश बताती रही है. उसने इस संबंध में ढेरों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया है, हालांकि, अब चार्जशीट सामने आने के बाद पुलिस अपने ही दावों में उलझती नज़र आ रही है|
मामले में मुख्य आरोपी बनाए गए वरिष्ठ पत्रकार और कार्यकर्ता सत्यम वर्मा को लेकर यूपी पुलिस का दावा है कि ‘वे शहर में नहीं थे पर साज़िश में भूमिका निभाई’, इसी चार्जशीट में एक गवाह कहता है कि उसने ‘वर्मा को अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के साथ धक्कामुक्की, पथराव और नारेबाज़ी करते हुए’ देखा था|
गौरतलब यह भी है कि वर्मा के परिजन पहले ही इस बात की तस्दीक कर चुके हैं कि वे लगभग दस सालों से नोएडा नहीं आए हैं|
यह एक अकेला अटपटा मामला नहीं है. जुलाई महीने में मामले से जुड़ी चार एफआईआर को लेकर दाखिल चार्जशीट में कई ऐसे बातें तथ्य की तरह पेश की गई हैं, जो परस्पर विरोधी हैं. गिरफ्तारी की तारीखों से लेकर आरोपियों की हिंसा स्थल पर मौजूदगी, मोबाइल फोन की बरामदगी, कथित भड़काऊ भाषणों और गवाहों के बयानों तक में, कई जगह ऐसे विरोधाभास हैं, जो पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं|
ज्ञात हो कि करीब चार महीने पहले नोएडा में न्यूनतम मजदूरी, ओवरटाइम भुगतान और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांगों को लेकर श्रमिकों का आंदोलन शुरू हुआ था. कुछ जगहों पर आंदोलन हिंसक हो गया, जिसका कारण मजदूर और कार्यकर्ता उस बल प्रयोग को मानते हैं, जो पुलिस ने बिना किसी उकसावे के किया, वहीं पुलिस का पक्ष है कि भीड़ अनियंत्रित हो गई थी, इसलिए बल का प्रयोग किया गया|
फिर पुलिस ने आंदोलन को एक ‘साजिश’ बताते हुए कई मजदूर और छात्र कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. इस मामले में कुल 14 एफआईआर दर्ज किए गए और सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं. अब इन 14 में से 4 एफआईआर में चार्जशीट दाख़िल हो चुकी है|
उत्तर प्रदेश पुलिस ने एफआईआर संख्या- 163/2026, 164/2026, 165/2026 और 169/2026 में चार्जशीट दाखिल कर दावा किया है कि उक्त आंदोलन मजदूरों का स्वस्फूर्त जुटान नहीं नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक ‘सुनियोजित साजिश’ थी. पुलिस के अनुसार, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं ने मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाया, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की योजना बनाई और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की|
चार्जशीट के के मुताबिक कार्यकर्ताओं ने वॉट्सऐप ग्रुप, सुनियोजित मुलाकातें, और वैचारिक आधार पर भीड़ को आंदोलन के लिए एकत्रित किया|
द वायर हिंदी ने इन चार्जशीटों का अध्ययन किया है, जिसमें कई विरोधाभास नज़र आते हैं. इस मामले में गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं और मजदूरों की रिहाई के लिए काम करने वाला संगठन ‘कैम्पेन फॉर रिलीज ऑफ वर्कर्स एंड एक्टिविस्ट्स ऑफ नोएडा’ (कारवां) ने पुलिस पर चार्जशीट में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया है|
रिमांडशीट और चार्जशीट में गिरफ्तारी की तारीखें अलग-अलग
चार्जशीट से गिरफ्तारियों की तारीखों को लेकर सवाल खड़ा होता है. एफआईआर 164 और 165 की चार्जशीट में आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान की गिरफ्तारी की तारीख 27 अप्रैल दर्ज की गई है. वहीं रूपेश राय की गिरफ्तारी 7 मई दिखाई गई है.
हालांकि, इन्हीं आरोपियों के रिमांड दस्तावेज़ों में इनकी गिरफ्तारी 17 अप्रैल बताई गई है|
इसी तरह एफआईआर 163 में दाख़िल चार्जशीट में आकृति चौधरी की गिरफ्तारी की तारीख 22 अप्रैल दर्ज है. सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान के लिए यह तारीख 24 अप्रैल है. लेकिन रिमांडशीट में इन सभी की गिरफ़्तारी की तारीख़ 15 अप्रैल दर्ज़ हैं|
हालांकि, सृष्टि ने अपनी और आकृति, मनीषा और रूपेश की गिरफ्तारी के दौरान फेसबुक पर लाइव वीडियो शुरू कर दी थी, जिससे उनकी गिरफ़्तारी की तारीख़ 11 अप्रैल पता चलता है|
पत्रकार सत्यम वर्मा के मामले में चार्जशीट में दावा किया गया है कि उन्हें 19 अप्रैल को फेज़-2 थाने से गिरफ्तार किया गया था, जबकि आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज के अनुसार उन्हें 17 अप्रैल की रात लखनऊ स्थित उनके घर से उठाया गया था|
वहीं, हिमांशु ठाकुर के मामले में एक ही चार्जशीट के भीतर कई विरोधाभास दिखाई देता है. केस डायरी के एक हिस्से में उन्हें 18 अप्रैल को दिल्ली के शालीमार बाग से गिरफ्तार करने का उल्लेख है, जबकि दूसरे हिस्से में गिरफ्तारी 19 अप्रैल को फेज़-3 थाना से बताया गया है|
जो जेल में थे, वे हिंसा कैसे कर रहे थे?
एफआईआर संख्या 164/26 में दायर चार्जशीट में एक और महत्वपूर्ण दावा यह किया गया है कि 13 अप्रैल को आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता, मनीषा चौहान, रूपेश राय, आदित्य आनंद और हिमांशु ठाकुर ने मौके पर मौजूद रहकर भड़काऊ भाषण दिए और हिंसा में भूमिका निभाई.
इस दावे पर आंदोलन से जुड़े लोग गंभीर सवाल उठाते हैं|
उनका कहना है कि आकृति, सृष्टि, मनीषा और रूपेश को 11 अप्रैल की शाम नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास से हिरासत में ले लिया गया था और अगले ही दिन उन्हें जेल भेज दिया गया. तो फिर 13 अप्रैल को उनके घटनास्थल पर मौजूद होने का पुलिस का दावा कैसे सही हो सकता है?
इसी तरह, हिमांशु ठाकुर को लेकर दावा है कि पुलिस द्वारा संलग्न मोबाइल लोकेशन रिकॉर्ड ही उनकी मौजूदगी कहीं और दिखाती है|
एफआईआर 169 की चार्जशीट में पुलिस ने दावा किया है कि 10 अप्रैल 2026 को हिमांशु ठाकुर नोएडा में मौजूद थे. हालांकि, इसी चार्जशीट की केस डायरी-21 में संलग्न उनके मोबाइल फोन के लोकेशन उन्हें दिल्ली स्थित उनके आवास पर दिखाता है. यानी, चार्जशीट में उनकी मौजूदगी को लेकर किया गया दावा उसी जांच के दौरान जुटाए गए डिजिटल साक्ष्यों से मेल नहीं खाते|
चार्जशीट में एक और महत्वपूर्ण विरोधाभास पत्रकार सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) लगाए जाने के आधार के रूप में दाख़िल किए गए दस्तावेज़ों से जुड़ा है|
सत्यम वर्मा के खिलाफ रासुका लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेज़ों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया था कि वह 10, 11 और 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में मौजूद थे. हालांकि, बाद में इन्हीं घटनाओं से संबंधित दाखिल चार्जशीट में पुलिस का दावा इससे अलग है|
चार्जशीट के अनुसार, सत्यम उन दिनों नोएडा में मौजूद नहीं थे. एफआईआर 163 की चार्जशीट में यह दर्ज है कि ‘अभियुक्त सत्यम वर्मा आंदोलन के समय मौके पर मौजूद नहीं हैं लेकिन आपराधिक षड्यंत्र कर आंदोलन को हिंसक आंदोलन बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई है.’
इसके उलट, चार्जशीट में एक गवाह का बयान दर्ज है जो कह रहा है कि उसने सत्यम वर्मा को आदित्य तथा हिमांशु के साथ रोड जाम करते, पुलिस पर पथराव करते और धक्का-मुक्की करते देखा. साथ ही पुलिस भी यह कह रही है कि उसे 10 अप्रैल की घटना का एक वीडियो प्राप्त हुआ है जिसमें अभियुक्त आदित्य और हिमांशु के साथ सत्यम वर्मा नारेबाज़ी कर रहे हैं|
वहीं सत्यम वर्मा के करीबियों का दावा है कि वे नोएडा में पीछे दस सालों से नहीं आए हैं|
मोबाइल फोन की बरामदगी भी सवालों के घेरे में
एफआईआर 165 की केस डायरी के अनुसार आकृति चौधरी का मोबाइल 26 अप्रैल को फेज़-2 थाना क्षेत्र के निम्मी विहार स्थित एक पार्क में रखे बैग से बरामद किया गया|
लेकिन दूसरी ओर एफआईआर 169 में शामिल मोबाइल लोकेशन रिकॉर्ड बताते हैं कि 11 अप्रैल की शाम तक उनका फोन बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन के आसपास सक्रिय था. इसी समय उन्हें हिरासत में लिए जाने का सबूत मौजूद है|
सवाल उठता है कि यदि गिरफ्तारी के बाद वे पुलिस हिरासत में थीं तो उनका बैग लगभग दस किलोमीटर दूर पार्क तक कैसे पहुंचा? सृष्टि गुप्ता के मोबाइल की बरामदगी को लेकर भी ऐसा ही सवाल उठाया गया है|
पुलिस का दावा है कि उनका फोन 26 अप्रैल को एसएनसी कंपनी के पास बरामद हुआ था. लेकिन चार्जशीट में दिए गए सृष्टि के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) के अनुसार 11 अप्रैल की शाम उनका फोन बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन के आसपास सक्रिय था. गिरफ्तारी के दौरान अपने लाइव वीडियो में सृष्टि यह दावा करते हुए दिखती हैं कि पुलिस ने उनका फोन छीन लिया है|
दिलचस्प बात यह है कि जारी किए गए सीडीआर में उनके फोन की लोकेशन उनकी गिरफ्तारी के बाद भी बदल रही थी|
भाषणों का आरोप, लेकिन सबूत कहां?
चार्जशीट का बड़ा हिस्सा इस दावे पर आधारित है कि कई आरोपियों ने मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाया. एफआईआर 164 में पुलिस ने दावा किया है कि 11 और 13 अप्रैल को आदित्य आनंद, रूपेश राय सहित अन्य आरोपियों ने भड़काऊ भाषण दिए|
लेकिन कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चार्जशीट में इन कथित भाषणों की न तो वीडियो रिकॉर्डिंग संलग्न है और न ही ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने वास्तव में हिंसा के लिए उकसाया था|
इसके उलट आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा है कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कई वीडियो में यही लोग मजदूरों से प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बनाए रखने की अपील करते दिखाई देते हैं|
एफआईआर 169 में योगेश मीणा के खिलाफ भी वॉट्सऐप ग्रुप में भड़काऊ मैसेज भेजने का आरोप लगाया गया है. हालांकि चार्जशीट में जिन मैसेजों के स्क्रीनशॉट लगाए गए हैं, उनमें कहीं भी प्रत्यक्ष रूप से हिंसा के लिए उकसाने वाली भाषा नहीं दिखाई देती|
जिस वॉट्सऐप ग्रुप पर भड़काऊ मैसेज भेजे जाने का दावा पुलिस करती है उसके बारे में मामले में याचिकाकर्ता केशव आनंद और उस ग्रुप पर सक्रिय रहे अन्य सदस्य कहते हैं कि योगेश ने कभी भी ग्रुप पर कोई भड़काऊ मैसेज नहीं किए, बल्कि सदस्यों से शांति बनाए रखने की अपील की थी|
केशव ने द वायर हिंदी को यह भी बताया कि उपलब्ध चैट रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि योगेश ने अनिल कुमार द्वारा डाले गए कथित भड़काऊ संदेशों का समर्थन नहीं किया था, बल्कि उन पर सवाल उठाए थे. बता दें कि अनिल कुमार गृह मंत्रालय में संविदा पर काम करते थे, उनके ऊपर आंदोलकों का आरोप है कि उन्होंने ग्रुप पर भड़काऊ मैसेज किए थे और वे पुलिस से मिले हुए थे|
एफआईआर 163/2026 की चार्जशीट में पुलिस ने 10 और 11 अप्रैल को भी हिंसक घटनाओं के होने का दावा किया है. लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए चार्जशीट में कोई वीडियो साक्ष्य या अन्य प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं कराया गया है|
कथित साजिश या सार्वजनिक कार्यक्रम?
चार्जशीट में पुलिस ने 22 मार्च को दिल्ली के करावल नगर में हुई एक बैठक को कथित साजिश की अहम कड़ी बताया है. पुलिस के अनुसार इसी बैठक में आंदोलन को हिंसक बनाने की योजना तैयार की गई|
इस दावे का भी आंदोलन से जुड़े लोग विरोध करते हैं|
उनका कहना है कि उस दिन करावल नगर में किसी गुप्त बैठक के बजाय एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित हुआ था, जिसमें बच्चों के लिए एक पुस्तकालय और ‘शहीद भगत सिंह युवा केंद्र’ का उद्घाटन किया गया था. कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं.
गवाहों के बयान भी एक जैसे
चार्जशीटों में दर्ज गवाहों के बयानों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं|
कई गवाहों के बयान शब्दशः एक जैसे हैं. कुछ मामलों में दर्जनों गवाहों ने लगभग समान भाषा में बयान दिए हैं.
आंदोलन से जुड़े लोग पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं कि क्या बयान स्वतंत्र रूप से दर्ज किए गए थे या पहले से तैयार प्रारूप के आधार पर लिखे गए हैं|
मार्क्सवादी विचारधारा बनी आरोप
एफआईआर 163 की चार्जशीट में पत्रकार सत्यम वर्मा के संदर्भ में उनके ‘मार्क्सवादी विचारों’ का उल्लेख भी किया गया है|
इसके अलावा इसी चार्जशीट में अभियुक्तों का मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होने का और विभिन्न वाम संगठनों से जुड़े होने का कई मौकों पर ज़िक्र किया गया है. अभियुक्तों के पास से ‘वाम साहित्य’ बरामद होने की बात कहीं गई है और उसे आंदोलन के लिए की गई कथित साजिश का हिस्सा बताया गया है.
एफआईआर संख्या 169 की चार्जशीट में यह दर्ज है कि ‘अभियुक्त के घर से क्रांति संबंधित किताब बरामद हुई थी, जिससे सिद्ध होता है कि अभियुक्त की विचारधारा क्रांतिकारी है.’
यहां एक नज़र उन किताबों पर डालना जरूरी हो जाता है, जिसे पुलिस ने गंभीर अपराध वाली एफआईआर से जुड़ी चार्जशीट में महत्वपूर्ण समझा है|
साहित्यों की सूची में दर्ज दूसरी ही किताब भगत सिंह और उनके साथियों पर लिखी इतिहासकार एस. इरफान हबीब की किताब ‘बहरों को सुनाने के लिए’ है. इस सूची में मार्क्सवादी सिद्धांतों पर शोध और विमर्श प्रकाशित करने वाले ‘दिशा संधान’ के बुकलेट है, सामाजिक कुरीतियों पर लिखी दत्ता भारती की किताब ‘एक कदम आगे दो कदम पीछे’ है. चर्चित किताब ‘दर्शन कोई रहस्य नहीं’, जो चीनी क्रांति के दौरान किसानों को आसान भाषा में दर्शन के बारे में पढ़ाए जाने को लेकर है|
इसके अलावा जनचेतना और मजदूर बिगुल जैसी पत्रिकाओं का नाम भी सूची में है. मार्क्सवाद, लेनिनवाद, नेपाल क्रांति, फासीवाद आदि पर किताबें हैं. कई किताबों के नाम स्पष्ट नहीं लिखे हैं. कई के संभवत: अधूरे लिखे हैं. लेकिन इस सूची की अधिकतर किताबें (जो पढ़ने में आ रही हैं) किसी भी सार्वजनिक पुस्तकालय या विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में पायी जा सकती हैं|
पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं के पास माओवादी साहित्य से जुड़ी किताबें या प्रतिबंधित किताबें पाई गई हैं|
यहां ध्यान देना जरूरी है कि पुलिस दो तरह की सूची सामने रखती है. एक सूची में उन किताबों के नाम हैं, जो आरोपियों के घर से मिली हैं. (इसका ऊपर ज़िक्र है) दूसरी सूची घर से नहीं बल्कि बाहर कहीं से मिली हैं, जिन्हें लेकर पुलिस का दावा है कि यह आरोपियों से जुड़ी हैं. लेकिन आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि पुलिस ने इसे ‘प्लांट’ किया है|
पुलिस का आरोप है कि सृष्टि के बैग से सीपीआई (माओवादी) की प्रतिबंधित किताब बरामद हुई. ध्यान रहे, पुलिस खुद मानती है कि उसे यह बैग सृष्टि के पास से नहीं बल्कि एक पार्क से मिला. पुलिस ने मनीषा के पास से भी प्रतिबंधित माओवादी साहित्य की कॉपी प्राप्त होने का दावा किया है. हिमांशु के कमरे, लैपटॉप, टेबलेट और अन्य डिजिटल उपकरण मे वामपंथी/माओवादी विचारधारा संबंधी सामग्री बरामद होने का आरोप है|
चार्जशीट में आरोपियों की कथित वैचारिक प्रतिबद्धता और उनके पास से बरामद पुस्तकों का उल्लेख किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट की वकील और इस मामले में कई अभियुक्तों का केस देख रही अधिवक्ता कंवलप्रीत कौर कहती हैं कि कानून इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है. किसी व्यक्ति के पास किसी विचारधारा से जुड़ी किताबों का होना या किसी राजनीतिक अथवा वैचारिक सोच से सहमत होना अपने-आप में न तो आपराधिक मंशा साबित करता है और न ही किसी हिंसक साजिश में उसकी संलिप्तता.
वह जोड़ती हैं:
हमारा संविधान हर नागरिक को सोचने, पढ़ने, बहस करने और अपनी राजनीतिक राय रखने की स्वतंत्रता देता है, चाहे वह विचार कितना भी अलोकप्रिय क्यों न हो. एक लोकतांत्रिक समाज में छात्र, शोधकर्ता, वकील और राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक और दार्शनिक विचारों का अध्ययन करते हैं. मार्क्स, आंबेडकर, गांधी या माओ को पढ़ना अपने-आप में किसी आपराधिक कृत्य का प्रमाण नहीं है|
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हाल ही में वर्नन गोंजाल्विस बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल किसी साहित्य को रखना या किसी विचारधारा से जुड़ाव रखना, जब तक उसके साथ हिंसा के लिए उकसाने, हिंसक गतिविधियों में भागीदारी या किसी गैरकानूनी कृत्य का ठोस साक्ष्य न हो, तब तक उसे अपराध नहीं माना जा सकता|
चार्जशीट में आरोपियों की कथित वैचारिक प्रतिबद्धता पर दिए गए जोर को कंवलप्रीत ने कानूनी रूप से भ्रामक बताया. उन्होंने जोड़ा कि भारत में वामपंथी राजनीतिक दल विधिवत पंजीकृत हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं. ऐसे में केवल किसी वामपंथी या रैडिकल राजनीतिक विचार से सहमति रखना अपराध नहीं हो सकता|
इस मामले में सीपीआई (एम) नेता और पूर्व सांसद बृंदा करात कहती हैं, ‘ये तो बेहद गलत है. क्या हमारे देश में केवल शाखा की विचारधारा (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) चलेगी? ये पहली बार ऐसे हुआ है कि मार्क्सवादी विचारधारा को मानने के आधार पर किसी को रासुका में या उसमें रखा गया है.’
मजदूरों की मांगें भी ‘अनुचित’
एफआईआर 163 की चार्जशीट में पुलिस ने मजदूरों की मांगों को ‘अनुचित मांगें’ बताया है. इन मांगों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, साप्ताहिक अवकाश और बेहतर कार्य परिस्थितियां शामिल थीं|
चार्जशीट में लिखा गया है कि ‘दिनांक 10/4/26 को सुबह 9 बजे फेज़ 2 थाना क्षेत्र में कई कंपनियों के कर्मचारियों ने अपनी ‘अनुचित मांगों’ को लेकर जगह-जगह रास्ते तथा मुख्य मार्ग जाम किए.’
पुलिस की चार्जशीट पर किए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि ये सभी मांगें श्रम कानूनों और श्रमिक अधिकारों से जुड़ी हैं, इन्हें ‘अनुचित’ कहना अपने आप में कई सवाल पैदा करता है|
यह भी बता दें कि आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में संशोधन की घोषणा भी की थी और इसे तक़रीबन 2500 रुपये बढ़ाया था. हालांकि इस बढ़ोतरी को लेकर भी सवाल उठे हैं. यानी एक तरफ सरकार मजदूरों की जिन मांगों पर विचार कर रही है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस उन मांगों को ‘अनुचित’ बता रही है|
पुलिस के समक्ष दिए गए कथित बयान
चार्जशीट में पुलिस ने आरोपियों के कथित बयानों को भी जांच का अहम आधार बनाया है.
दस्तावेज़ के अनुसार, सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान ने कथित तौर पर मार्क्सवादी और माओवादी विचारधारा से प्रभावित होने की बात कही. पुलिस का दावा है कि सृष्टि ने हिंसक आंदोलन की योजना में शामिल होने, आदित्य आनंद द्वारा भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने की रणनीति तय करने, वीडियो के जरिए मजदूरों को भड़काने, प्रशासन के खिलाफ माहौल बनाने और हिंसा में इस्तेमाल सामग्री घटनास्थल तक पहुंचाने की बात स्वीकार की|
हिमांशु ठाकुर के कथित बयान के अनुसार, उन्होंने प्रदर्शन को उग्र बनाने की योजना, 10 अप्रैल को आदित्य आनंद और रूपेश राय के उनके घर पर रुकने तथा 11 अप्रैल के प्रदर्शन को उग्र बनाने की तैयारी का उल्लेख किया. पुलिस के मुताबिक, उन्होंने पत्थर, डंडे और ज्वलनशील पदार्थ उपलब्ध कराने की बात भी स्वीकार की और खुद को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित बताते हुए कहा कि उनका ‘छुपा कार्यवृत्त माओवाद’ है|
पुलिस के दावों पर सवाल उठाते हुए अधिवक्ता कंवलप्रीत कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में यह स्वीकार कर चुका है कि पुलिस हिरासत में हिंसा एक गंभीर और व्यापक समस्या है. यही वजह है कि पुलिस के समक्ष दिए गए कथित स्वीकारोक्ति वाले बयानों को अदालतें सबसे कमजोर साक्ष्यों में गिनती हैं. उन्होंने कहा कि रूपेश राय के कथित बयान को जिस तरह चार्जशीट में पेश किया गया है, उससे इसकी प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं|
उनके मुताबिक, यह बयान अभियोजन के पक्ष को मजबूत करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर तैयार किया गया प्रतीत होता है और इसके दबाव में दर्ज कराए जाने की आशंका है|
कंवलप्रीत ने आगे कहा कि इस आशंका को रूपेश राय और आदित्य आनंद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका भी बल देती है, जिसमें दोनों ने नोएडा पुलिस पर हिरासत में प्रताड़ना का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि याचिका के साथ संलग्न आदित्य आनंद के मेडिकल रिपोर्ट भी पुलिस हिरासत के दौरान उन्हें लगी चोटों का उल्लेख करते हैं|
विदेशी एवं फिलिस्तीन समर्थक संगठनों से संबंध आकृति के बयान के मुख्य बिंदु में से एक चार्जशीट में आकृति चौधरी के कथित बयान के आधार पर पुलिस ने दावा किया है कि उन्होंने इंटरनेशनल पीपुल्स सॉलिडैरिटी फॉर फिलिस्तीन (आईपीएसपी) और बॉयकॉट, डिवेस्टमेंट एंड सेक्शंस (बीडीएस) जैसे फिलिस्तीन समर्थक समूहों से जुड़ाव स्वीकार किया|
चार्जशीट में यह भी दावा किया गया है कि उन्होंने विदेशी संपर्कों से टेलीग्राम और फेसटाइम जैसे माध्यमों से संवाद करने की बात कही, ताकि कॉल रिकॉर्ड न हो|
पुलिस के मुताबिक, उनके मोबाइल फोन से गाजा समर्थक बताए गए तीन विदेशी संपर्कों के नंबर भी मिले हैं. इसके अलावा, चार्जशीट में पुलिस ने दावा किया है कि आकृति ने इन माध्यमों का इस्तेमाल ‘एंटी इंडिया प्रोपगैंडा’ फैलाने और मजदूरों के असंतोष का लाभ उठाकर हिंसक आंदोलन खड़ा करने की योजना से जुड़े कथित तथ्यों को स्वीकार किया|
यहां ध्यान देने वाली बात है कि चार्जशीट में किसी व्यक्ति के फिलिस्तीन समर्थक समूहों से कथित जुड़ाव को जिस तरह पेश किया गया है, उससे यह सवाल उठता है कि क्या केवल फिलिस्तीन के समर्थन या ऐसे समूहों से संपर्क को ही अपराध का आधार माना गया है|
फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत का समर्थन उसकी आधिकारिक विदेश नीति का लंबे समय से हिस्सा रहा है. भारत ने 1974 में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को फिलिस्तीनी लोगों का एकमात्र और वैध प्रतिनिधि मान्यता देने वाले पहले गैर-अरब देश के रूप में भूमिका निभाई थी और 1988 में फिलिस्तीन को एक राज्य के रूप में मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में शामिल था|
इससे पहले 1981 में भारत ने फिलिस्तीनी जनता के साथ अपनी एकता अभिव्यक्त करने वाला डाक टिकट भी जारी किया था|
फिलिस्तीन के साथ भारत के राजनयिक संबंध केवल औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2018 में फिलिस्तीन की यात्रा की थी, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री की इस तरह की पहली यात्रा थी. इससे पहले तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जनवरी 2016 और तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर नवंबर 2016 में फिलिस्तीन की यात्रा कर चुके थे. दिसंबर 2023 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी तत्कालीन फिलस्तीनी प्रधानमंत्री मोहम्मद श्तायेह से फोन पर बातचीत कर फिलिस्तीन लोगों के प्रति भारत के समर्थन को दोहराया था|
भारत ने पिछले वर्षों में फिलिस्तीन को विकास सहयोग और बजटीय सहायता भी दी है. ऐसे में केवल फिलिस्तीन के समर्थन, फिलिस्तीन समर्थक विचार रखने या फिलिस्तीन से जुड़े किसी संगठन के संपर्क में होने को अपने आप में किसी आपराधिक गतिविधि का प्रमाण नहीं माना जा सकता|
हालांकि, यदि पुलिस का आरोप यह है कि किसी संगठन या विदेशी संपर्क के माध्यम से भारत में हिंसा भड़काने, गैरकानूनी गतिविधि करने या किसी अन्य अपराध की योजना बनाई गई, तो उस आरोप के समर्थन में विशिष्ट और स्वतंत्र साक्ष्यों की आवश्यकता होगी. चार्जशीट में कथित स्वीकारोक्ति का उल्लेख होना और उस कथित स्वीकारोक्ति की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना दो अलग-अलग बातें हैं|
टेलीग्राम और फेसटाइम के इस्तेमाल को लेकर पुलिस के तर्क पर भी इसी तरह सवाल उठता है. दोनों सामान्य डिजिटल संचार माध्यम हैं और किसी व्यक्ति का किसी खास ऐप का इस्तेमाल करना अपने आप में आपराधिक गतिविधि का संकेत नहीं है. यदि पुलिस का दावा है कि आकृति ने टेलीग्राम और फेसटाइम का इस्तेमाल इसलिए किया ताकि उनकी बातचीत का कॉल रिकॉर्ड उपलब्ध न हो सके, तब भी केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बातचीत का उद्देश्य आपराधिक था. निजी संचार की गोपनीयता भारतीय संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है|
आकृति चौधरी के कथित पुलिस बयान को लेकर भी चार्जशीट के दावे और स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है. पुलिस ने उनके हवाले से जिन गतिविधियों और कथित मंशाओं का उल्लेख किया है, उनकी स्वतंत्र पुष्टि किस स्तर पर हुई है और क्या चार्जशीट में इन दावों के समर्थन में संदेश, दस्तावेज, वित्तीय लेनदेन, प्रत्यक्ष गवाह या अन्य स्वतंत्र साक्ष्य पेश किए गए हैं- यह महत्वपूर्ण सवाल है|
आकृति के परिचितों और उपलब्ध पृष्ठभूमि के अनुसार वह थिएटर से जुड़ी रही हैं और सामाजिक मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखती रही हैं. उनके खिलाफ पहले किसी आपराधिक मामले या एफआईआर का रिकॉर्ड होने की जानकारी भी सामने नहीं आती|
‘चार्जशीट में मौजूद स्पष्ट त्रुटियां अभियोजन के पूरे मामले की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं’
अधिवक्ता कंवलप्रीत कौर ने द वायर हिंदी से कहा कि ‘अगर इन मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दाखिल चारों चार्जशीटों का अध्ययन किया जाए, तो यह साफ़ होता है कि इनमें आरोपियों के खिलाफ न तो शारीरिक हिंसा और न ही भड़काऊ भाषणों के ऐसे ठोस उदाहरण हैं, जो अभियोजन के दावों को साबित कर सकें. इसके बजाय, चार्जशीट बार-बार आरोपियों की कथित मार्क्सवादी विचारधारा का उल्लेख करती हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि श्रमिकों के संगठन, ट्रेड यूनियन आंदोलनों, लोकतांत्रिक असहमति और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन जैसे संवैधानिक अधिकारों को ही अपराध की तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है.’
कई मामलों में जमानत, फिर भी जेल में
आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए कार्यकर्ताओं पर दर्ज 11 एफआईआर में कई आरोपियों को अलग-अलग मामलों में जमानत मिल चुकी है, लेकिन कुछ मामलों में जमानत नहीं मिलने के कारण वे अब भी जेल में हैं|
एफआईआर 116, 117 और 157 में लगभग सभी आरोपियों को जमानत मिल गई है. एफआईआर 165 में 5, एफआईआर 164 में 5, एफआईआर 151 में 5 और एफआईआर 149 में 2 आरोपियों को जमानत मिली है. वहीं, एफआईआर 163, 158 और 172 में रूपेश के भाई मधुरेश को छोड़कर किसी को जमानत नहीं मिली है|
कुल मिलाकर, मनीषा को 11 में से 8, योगेश और रूपेश को 6-6, हिमांशु को 7, आदित्य और सृष्टि को 5-5, सत्यम वर्मा को 4 और आकृति को 3 मामलों में जमानत मिल चुकी है|द वायर हिंदी ने मामले से संबंधित सवाल पुलिस को भेजे हैं, जवाब मिलने पर खबर को अपडेट किया जाएगा|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









