कर्नाटक हाई कोर्ट ने दो ट्रांसजेंडर पर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी जारी रखने का निर्देश दिया
याचिकाकर्ताओं ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन एक्ट, 2026 की वैधता को चुनौती दी और दावा किया कि इलाज के बीच में होने के बावजूद, इलाज कर रहे डॉक्टर थेरेपी का निर्धारित कोर्स जारी रखने को तैयार नहीं हैं।
जस्टिस न्यूज
बेंगलुरु: कर्नाटक हाई कोर्ट ने बेंगलुरु के एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों को मौजूदा मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार दो ट्रांसजेंडर पर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) जारी रखने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ताओं ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन एक्ट, 2026 की वैधता को चुनौती दी और दावा किया कि इलाज के बीच में होने के बावजूद, इलाज कर रहे डॉक्टर थेरेपी का निर्धारित कोर्स जारी रखने को तैयार नहीं हैं।
जस्टिस सचिन शंकर मगदुम ने गुरुवार को पास किए गए अंतरिम आदेश में कहा, “संबंधित डॉक्टर और मेडिकल अधिकारी बिना किसी रुकावट के ऐसे इलाज को जारी रखने में मदद करेंगे। हालांकि, इलाज जारी रखना इस रिट पिटीशन के नतीजे और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पास किए जाने वाले किसी भी आदेश पर निर्भर करेगा, जिसमें यूनियन ऑफ़ इंडिया द्वारा शुरू की गई कोई भी ट्रांसफर कार्रवाई भी शामिल है।”
पिटीशनर्स ने कहा कि वे ट्रांसजेंडर व्यक्ति हैं जो खुद को महिला के तौर पर पहचानते हैं और 2026 अमेंडमेंट एक्ट के सेक्शन 2(k) के तहत “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की बदली हुई परिभाषा से होने वाले नतीजों से दुखी हैं।
पिटीशनर्स ने दावा किया कि वे 11 नवंबर, 2023 से एक हॉस्पिटल में हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) करवा रहे हैं, और उन्हें ट्रांसजेंडर आइडेंटिटी कार्ड भी जारी किए गए हैं।
उनका कहना है कि बीच में इलाज से मना करना, भारत के संविधान के आर्टिकल 14, 15, 16, 19, और 21 के तहत मिले उनके बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने केरल हाई कोर्ट के एक अंतरिम आदेश का भी हवाला दिया, जो एक ऐसे ही मामले में दिया गया था, जिसमें इसी तरह के लोगों को थेरेपी जारी रखने की इजाज़त दी गई थी और बिना किसी रुकावट के इलाज को आसान बनाने के लिए सही निर्देश दिए गए थे। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि अधिकारियों ने ऐसे इलाज को रोकने के लिए कोई ज़बरदस्ती की कार्रवाई शुरू की है या करने का सुझाव दिया है।
आगे यह भी कहा गया कि बदलाव की वैलिडिटी से जुड़ा मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट के सामने है। कोर्ट को बताया गया कि केंद्र सरकार अलग-अलग हाई कोर्ट में पेंडिंग सभी ऐसी ही याचिकाओं को ट्रांसफर करने के लिए एक एप्लीकेशन फाइल करने पर विचार कर रही है। जस्टिस मगदुम ने कहा कि पिटीशनर्स के पेश किए गए मेडिकल रिकॉर्ड, पहली नज़र में, बताते हैं कि दोनों 11 नवंबर, 2023 से थेरेपी ले रहे हैं।
कोर्ट ने कहा, “इस स्टेज पर, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह के चल रहे मेडिकल ट्रीटमेंट को अचानक बंद करने से उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरे और नुकसानदायक नतीजे हो सकते हैं। इस बात पर भी कोई विवाद नहीं है कि मौजूदा पिटीशन में उठाए गए मुद्दे, जिसमें बदले हुए कानूनी नियम को चुनौती देना भी शामिल है, सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींच रहे हैं और उनके आधिकारिक तौर पर निपटाए जाने की संभावना है। मामले के तथ्यों और हालात को देखते हुए, इस कोर्ट का मानना है कि बड़े मुद्दों पर फैसला होने तक, पिटीशनर्स को सीमित अंतरिम सुरक्षा देने की ज़रूरत है ताकि यह पक्का हो सके कि चल रहे मेडिकल ट्रीटमेंट में कोई रुकावट न आए।”









