जाति से संघर्ष से संविधान तक, ये हैं अंबेडकर के 10 महान परिवर्तनकारी कदम बाबासाहेब अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस 2025 पर जानें डॉ. भीमराव अंबेडकर के 10 महान परिवर्तनकारी कदम
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरे देश में जातियां सदियों से सामाजिक ढांचे का एक बड़ा और जटिल अध्याय रही हैं। जिनके शोषण और दुर्दशा पर ढाल बनकर चली लेखनी से आज दलित साहित्य भी समृद्ध हुआ है।
इन्हीं जटिलताओं के बीच एक व्यक्तित्व ऐसा उभरा जिसनेन केवल जाति-व्यवस्था की कठोर दीवारों को चुनौती दी, बल्कि समानता, न्याय और मानवाधिकारों के नए युग की नींव रखी।डॉ. भीमराव अंबेडकर जिन्होंने सामाजिक भेदभाव की आग में अपना बचपन जलता हुआ देखा, उसी पीड़ा को प्रेरणा बनाकर वे जाती व्यवस्था का दंश झेल रहे करोड़ों वंचितों की आवाज बन गए। उनका जीवन भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों का बेहतरीन उदाहरण बन चुका है वहीं उनका संघर्ष हर उस व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक की तरह काम करता है जो एकन्यायपूर्ण समाज का सपना देखता है। बाबासाहेब कहते थे कि, ‘हमारे लिए जीवन का एक ही उद्देश्य होना चाहिए कि, हमें अपनी मेहनत और अपने विचारों से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है। डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (अब डॉ. अंबेडकर नगर) में हुआ था। वे सैन्य पृष्ठभूमि वाले महार परिवार में पैदा हुए थे|और आगे चलकर भारत के संविधान निर्माता, सामाजिक न्याय के सेनानी और एक महान अर्थशास्त्री बने। इनका निधन 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनके आवास 26, अलीपुर रोड पर हुआ था। इस दिन को पूरे देश में महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है।आज 6 दिसंबर को संविधान निर्माता आंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर हम उनके उन उल्लेखनीय कार्यों को याद करते हैं, जिन्होंने सिर्फ इतिहास नहीं बदला, बल्कि भारत के सामाजिक और संवैधानिक ढांचे को एक नई दिशा दी
01 )भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार
बनाया। उन्होंने सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का अधिकार दिलाने के लिए ऐतिहासिक बदलाव किए। डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारतीय संविधान का ‘मुख्य वास्तुकार’ कहा जाता है। संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक ऐसा संविधान तैयार किया, जिसने भारत को आधुनिक, प्रगतिशील और समतामूलक राष्ट्र बनाया। उन्होंने सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का अधिकार दिलाने के लिए ऐतिहासिक बदलाव किए। दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और कमजोर वर्गों के लिए सुरक्षा और अवसर सुनिश्चित करने वाले प्रावधान उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण हैं। उनके नेतृत्व में भारत में सामाजिक न्याय की मजबूत नींव रखी गई।
02 )दलितों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष
बाबासाहेब ने बचपन से ही जातिवाद और छुआछूत का दर्द झेला था। यही कारण था कि उन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों और दबे-कुचले वर्गों के सम्मान और अधिकारों के संघर्ष में लगा दिया। उन्होंने स्वयं को ‘हरिजन’ कहे जाने का विरोध किया और जोर देकर कहा कि दलितों को सम्मानजनक जीवन, शिक्षा और अवसर मिलना उनका अधिकार है, एहसान नहीं। भारत को एक न्यायसंगत समाज बनाने के लिए उन्होंने सामाजिक आंदोलन, लेखन और राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से क्रांति लाई।
03)इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना
1936 में अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य श्रमिक वर्ग, दलितों और किसानों के अधिकारों की लड़ाई लड़ना था। उन्होंने मजदूरों के न्यूनतम वेतन, काम के घंटे और श्रमिक कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर आवाज उठाई। यह पार्टी भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण आधार बनी।
04 )शिक्षा को बदलाव का शक्तिशाली हथियार बनाया
अंबेडकर का कहना था कि, ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। उन्होंने शिक्षा को मुक्ति और परिवर्तन का सबसे सशक्त साधन माना। स्वयं कई डिग्रियां हासिल करने के बाद उन्होंने वंचित समुदायों के लिए छात्रावास, छात्रवृत्तियां, और शिक्षा को सुलभ बनाने के कई प्रयास किए। उनका लक्ष्य था कि समाज के हर बच्चे विशेषकर दलितों और पिछड़ों को शिक्षा के बराबर अवसर मिलें। आज भारत में जो शैक्षणिक अवसरों का विस्तार दिखता है। उसकी नींव उनके विज़न की ही प्रेरणा है।
05 )बौद्ध धर्म की ओर ऐतिहासिक दिशा-परिवर्तन
1956 में डॉ. अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाकर भारतीय समाज में ऐतिहासिक परिवर्तन की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म समानता, करुणा और अहिंसा पर आधारित है जो एक न्यायपूर्ण समाज की आधारशिला है। यह कदम वंचित वर्गों को सामाजिक बंधनों से मुक्ति दिलाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।
06 )समानता और स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष
भारतीय समाज में सच्ची समानता की स्थापना अंबेडकर की दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थी। उन्होंने संविधान में ऐसे प्रावधान बनाए, जो हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी सफल है, जब सभी को बराबर अवसर मिले और किसी भी जाति-वर्ग के आधार पर भेदभाव न हो।
07 )महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई बनी हिंदू कोड बिल
अंबेडकर महिलाओं के अधिकारों के सबसे बड़े संरक्षक थे। उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को को संपत्ति का अधिकार, तलाक का अधिकार और विवाह में समानता दिलाने का प्रयास किया। हालांकि उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने कभी महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए अपनी आवाज कमजोर नहीं पड़ने दी।
08 )जातिवाद और सामाजिक भेदभाव का दृढ़ विरोध
डॉ. अंबेडकर का दृढ़ मत था कि जातिवाद भारत की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने ‘उन्होंने ‘जाति का विनाश’ (Annihilation of Caste) जैसे क्रांतिकारी ग्रंथ लिखे, जो आज भी भारतीय समाज के लिए मार्गदर्शक हैं। उनकी सोच थी यदि भारत को आगे बढ़ना है, तो जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करना ही होगा।
09 )सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को संविधान में मजबूत स्थान
सिर्फ राजनीतिक अधिकारों की बात करना अंबेडकर को पर्याप्त नहीं लगता था। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता को भी उतना ही महत्व दिया। आरक्षण व्यवस्था की अवधारणा भी उसी सोच का हिस्सा थी, जिससे वंचित वर्गों को मुख्यधारा में आने का अवसर मिल सके।
10 )संसद और सरकार में उल्लेखनीय योगदान
स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री के रूप में अंबेडकर ने देश की कानूनी संरचना को मजबूत किया। राज्यसभा और संविधान सभा में जातिगत बंधनों को तोड़ते हुए उनकी भूमिका बेहद प्रभावशाली रही। उन्होंने समतावादी सोच के साथ एक आधुनिक भारत के निर्माण की नींव नीतियों, सुधारों और संवैधानिक सिद्धांतों के माध्यम से रखी।
डॉ. भीमराव अंबेडकर सिर्फ एक दलित नेता या संविधान निर्माता नहीं थे बल्कि वे समाज में दुर्दशा के शिकार दबे कुचले और वंचितों के अधिकारों के संरक्षक और आधुनिक भारत के निर्माता थे। उनके विचार आज भी भारत के लोकतंत्र को शक्ति देते हैं और हमें एक समानता-आधारित समाज की दिशा में प्रयास करने के लिए प्रेरित करते हैं।
सौजन्य :न्यूज़ ट्रैक
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