वन विनाश और दिल्ली की ज़हरीली हवा: सरकार कब जागेगी?
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के खतरे से जूझ रही है। यदि यह खतरा और बढ़ता है तो मानवीय जीवन के लिए बड़ा संकट पैदा हो सकता है। यही कारण है कि साम्राज्यवादी देश भी इसके प्रति चिंता जताते हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि इसकी जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी जाए। ब्राजील के नगर बेलम में 10–21 नवंबर तक आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन—कॉप30—लगभग बेनतीजा रहा। यह सम्मेलन पेरिस समझौते की दसवीं वर्षगांठ भी था। सम्मेलन में भारत ने अपनी बात जोरदार तरीके से रखते हुए कहा कि विकसित देश, विकासशील देशों से अपनी असफलताओं की भरपाई की उम्मीद न करें। कार्बन उत्सर्जन के लिए विकसित देश ही अधिक जिम्मेदार हैं। यही कारण है कि अमेरिका जैसे विकसित देशों ने इस सम्मेलन में हिस्सेदारी भी नहीं ली।
सुनील कुमार
जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त 2025 को लाल किले से भी चिंता जता चुके हैं, लेकिन व्यवहारिक तौर पर सरकार इस मुद्दे को लेकर चिंतित नहीं दिखती। जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक विकास के नाम पर जल–जंगल–जमीन की बर्बादी है। भारत में बहुत तेज़ी से वन समाप्त हो रहे हैं, जिसके कारण देश का कार्बन उत्सर्जन भी साल–दर–साल तेज़ी से बढ़ रहा है।
1990 में उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण से पहले भारत का कार्बन उत्सर्जन 600.68 मिलियन मीट्रिक टन था, जो 2024 में बढ़कर 3962 मिलियन मीट्रिक टन हो गया और अनुमान है कि 2025 में यह 4000 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच जाएगा। इससे स्पष्ट है कि भारत में जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ता जा रहा है। इस वर्ष के मानसून में हिमाचल, जम्मू–कश्मीर और उत्तराखंड में आई तबाही इसकी गवाही दे चुकी है। कार्बन उत्सर्जन में कृषि क्षेत्र का योगदान मात्र 1 प्रतिशत है, जबकि पावर इंडस्ट्री का 47 प्रतिशत, उद्योगों का 22 प्रतिशत, परिवहन क्षेत्र का 11 प्रतिशत और निर्माण क्षेत्र का 8 प्रतिशत हिस्सा है।
भारत में देशी-विदेशी की लूट को बढ़ावा देते हुए वनों की कटाई तेज़ी से हो रही है और उसकी जगह कृत्रिम रूप से लगाए गए नए वन, सरकारी आँकड़ों में ‘वन क्षेत्र’ के रूप में जोड़ दिए जाते हैं। सरकार ने 24 जुलाई 2025 को राज्यसभा में बताया कि 2019 से 2023 के बीच मध्यप्रदेश में 408.56 वर्ग किलोमीटर और अरुणाचल प्रदेश में 806.43 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कम हुआ है। भारत वन स्थिति (ISFR) रिपोर्ट के अनुसार 2019 में अरुणाचल प्रदेश का वन क्षेत्र 66,688 वर्ग कि.मी. था, जो 2023 में घटकर 65,881.57 वर्ग कि.मी. रह गया।

मध्यप्रदेश में 2019 में 77,483 वर्ग कि.मी. का वन क्षेत्र था, जो 2023 में घटकर 77,073.44 वर्ग कि.मी. हो गया। नागालैंड में 2019 के 17,119 वर्ग कि.मी. से 2023 में वन क्षेत्र घटकर 12,227.47 वर्ग कि.मी. रह गया। मणिपुर में 2019 के 16,487 वर्ग कि.मी. से 2023 में 12,222.47 वर्ग कि.मी. रह गया। मेघालय में 2019 के 17,119 वर्ग कि.मी. से 2023 में वन क्षेत्र घटकर 16,966.46 वर्ग कि.मी. रह गया।
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में लॉयड मेटल्स ऐंड एनर्जी लिमिटेड को आयरन ओर परियोजना के लिए 937 हेक्टेयर क्षेत्र में 1.23 लाख पेड़ काटने की अनुमति दी गई है। महाराष्ट्र के नासिक में कुंभ की तैयारी के लिए 1700 पेड़ काटे जाने की संभावना है। आंध्र प्रदेश में 2001 से 2024 के बीच 42.4 हज़ार हेक्टेयर वन नष्ट हुए हैं, जिनमें अकेले 2024 में 468 हेक्टेयर और 2017 में 561 हेक्टेयर वन समाप्त कर दिए गए।
उत्तराखंड में पिछले 20 वर्षों में विकास के नाम पर 50 हज़ार हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हुआ है। छत्तीसगढ़ में हसदेव का जंगल—जिसे भारत के फेफड़े के रूप में जाना जाता है—26 जून 2025 को डीएफ़ओ द्वारा 1,742.60 हेक्टेयर भूमि को खनन कार्य के लिए हस्तांतरित कर दिया गया, जिसमें 4,48,874 पेड़ मौजूद हैं। डीएफ़ओ ने अपने नोट में यह भी लिखा कि यह धार्मिक और पुरातात्विक महत्व का क्षेत्र है।
छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में प्रस्तावित गोदावरी इस्पात प्रा. लि. कंपनी ने जनसुनवाई से पहले ही 5000 से अधिक पेड़ कटवा दिए, जबकि स्थानीय आदिवासी समाज इसका विरोध कर रहा है। लद्दाख में सोलर ऊर्जा परियोजना के लिए अदानी समूह को 20,000 एकड़ भूमि दी जा रही है, जिससे बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नुकसान तय है।
इधर, राष्ट्रीय स्तर पर वन क्षेत्र बढ़ने के सरकारी दावे भ्रम पैदा करते हैं। 2019 के 712,249 वर्ग कि.मी. से 2023 में वन क्षेत्र 715,342.61 वर्ग कि.मी. बताया गया है। लेकिन यह वृद्धि पुराने घने जंगलों की नहीं, बल्कि नए लगाए गए एकरूपी पौधों की है।
पुराने जंगल सदियों पुराने वृक्षों, वन्यजीवों, कवक, झाड़ियों, बेलों और जैव–विविधता से भरे होते हैं। नए ‘वन क्षेत्र’ में जैव–विविधता नहीं होती। वे घने नहीं होते, उनमें न पशु–पक्षी होते हैं, न ही आदिवासी समुदाय की संस्कृति, भोजन और औषधीय परंपराओं से उनका कोई रिश्ता होता है। पुराने वृक्ष जहाँ भारी मात्रा में कार्बन सोखते हैं, वहीं नए पेड़ यह क्षमता नहीं रखते।
जलवायु परिवर्तन का वायु प्रदूषण से गहरा रिश्ता है। दोनों एक–दूसरे को और बदतर बनाते हैं। उद्योग, खनन, जंगलों की कटाई, कचरा जलाना और पेट्रोल–डीज़ल आधारित परिवहन इसका बड़ा कारण हैं। हर साल सर्दियों में मैदानी इलाकों में लोग गंभीर वायु प्रदूषण से जूझते हैं। दिल्ली की हवा कई महीनों से ‘बेहद खतरनाक’ श्रेणी में पहुँच चुकी है।
दिल्ली में 50 प्रतिशत दफ़्तर कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने को कहा गया है। प्रदूषण बढ़ते ही दिल्ली सरकार 6 लाख रुपये के 15 एयर–प्यूरीफायर का ऑर्डर दे देती है, जबकि दिल्ली की विशाल आबादी न तो घर पर बैठकर काम कर सकती है और न ही एयर–प्यूरीफायर खरीद सकती है।
निर्माण कार्य रोक दिए जाते हैं, जिससे मज़दूर रोज़ काम के लिए लेबर चौक और औद्दोगिक इलाके में भटकते हैं। उनकी सेहत और बिगड़ती है। दुकानदार और रेहड़ी–पटरी वाले दोहरी मार झेलते हैं—एक तरफ ग्राहक घरों से बाहर नहीं निकलते, दूसरी तरफ कमाई घटने से उनकी क्रय–शक्ति कम हो जाती है। औद्योगिक मजदूरों को रोज़ाना प्रदूषण के सबसे उच्च स्तर पर सुबह-शाम यात्रा करनी पड़ती है।
स्कूल हाइब्रिड मोड में चल रहे हैं, जिससे गरीब तबके के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे। घर में बंद रहने पर वे बाहर खेलते हैं, और प्रदूषण का प्रभाव और गंभीर हो जाता है। बच्चे—जिनका भविष्य साफ़ हवा में सांस लेने से जुड़ा है—आज अस्थमा, फेफड़ों की सूजन और आँखों की जलन से जूझ रहे हैं। 2021 में वायु प्रदूषण के कारण 5 साल तक के 1,69,000 से अधिक बच्चों की मृत्यु का अनुमान है।
बुज़ुर्ग और बीमार लोग अधिक गंभीर रोगों का सामना कर रहे हैं। 2021 में भारत में 20 लाख लोगों की मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण हुईं। गर्भवती महिलाएँ और नवजात शिशु सबसे अधिक खतरे में हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि जहरीली हवा गर्भ में पल रहे शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल रही है।
लेकिन यह समस्या सिर्फ एक–दो माह या एक–दो साल की नहीं है, यह लगातार बढ़ रही है। प्रदूषण की वजह से हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और फेफड़ों के कैंसर, क्षय रोग के मामले तेजी से बढ़े हैं और सरकारें इसके समाधान के प्रति गंभीर नहीं दिखतीं। वे इसकी जड़ तक जाने के बजाय एक–दूसरे और किसानों पर दोष मढ़ती रहती हैं।
पिछले दशकों में भारत में बाजारवादी व्यवस्था और मुनाफाखोरी का बेहिसाब विस्तार हुआ है। इसके साथ व्यक्तिवादी और भोगवादी संस्कृति भी पनपी है। लोग तात्कालिक सुविधाओं के लिए यह भूल जाते हैं कि यह व्यवस्था हमारी हवा और जीवन की गुणवत्ता को नष्ट कर रही है। गर्मी बढ़ी तो एसी–कूलर खरीदो, प्रदूषण बढ़ा तो मास्क–एयर प्यूरीफायर खरीदो। इससे बाजार और मुनाफाखोरों का फायदा होता है, जबकि पर्यावरण और जीवन की हालत और बदतर होती जाती है। उपरोक्त आंकड़े भी बताते हैं की उदारीकरण से देशी-विदेशी पूंजीपति के लूट ने मानव जीवन और प्रकृति में जहर घोलने का काम किया है।
आज महानगरों में हवा का हर झोंका याद दिलाता है कि ‘विकास’ की राह हमारे फेफड़ों—यानी जिंदगी—की कीमत पर बनी है। यही स्थिति धीरे–धीरे गांवों में भी फैल रही है। प्रकृति मानव–निर्मित सीमाओं को नहीं मानती। तो क्या भारत की जनता की ज़िंदगी किसी कीमत की नहीं? क्या प्रदूषण भी सरकार और मुनाफाखोरों के लिए ‘आपदा में अवसर’ है?
दिल्ली सरकार पहले कृत्रिम बारिश की बात करती रही, लेकिन करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी वह असफल रही। अब दूसरी जगहों से तुलना की जाती है, जबकि दिल्ली सरकार खुद प्रदूषण को ‘बेहद गंभीर’ मानते हुए GRAP–3 लागू कर चुकी है। दिल्ली में कई दिनों से AQI 400 से 500 के बीच मापा जा रहा है, जो अत्यंत खतरनाक है।
जब छात्र संगठन और पर्यावरणी संगठन स्वच्छ हवा की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं, तो पुलिस उन्हें रोकती और हिरासत में लेती है। 5 और 9 नवंबर को शांति–पूर्ण प्रदर्शन भी नहीं करने दिया गया और प्रदर्शनकारियों को डिटेन कर दिल्ली के बाहरी इलाकों में रात में छोड़ दिया गया। 23 नवंबर को जब इंडिया गेट पर स्वच्छ हवा के लिए प्रदर्शन करने पहुँचे, तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया और 23 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
एक तस्वीर सामने आई जिसमें एक छात्र के सीने पर बैठा पुलिसकर्मी उसके मुंह को दबा रहा था और दो–तीन पुलिसकर्मी उसके हाथ–पैर पकड़े हुए थे—यह अत्यंत क्रूर दृश्य था। प्रदर्शनकारियों में कुछ लोग पर्यावरण संरक्षण के नारे लगाते हुए ‘जल–जंगल–जमीन बचाओ’ और साथ ही ‘हिड़मा अमर रहे’ के नारे भी लगा रहे थे। कुछ प्रदर्शनकारियों को मानना था की हिड़मा की लड़ाई मध्य भारत में जल–जंगल–जमीन बाचने की लड़ाई थी जो प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। जुड़ा हुआ है। सरकार और उसकी एजेंसियों और गोदी मीडिया ने इन नारों को चर्चा में लाकर प्रदूषण के मुद्दे से ध्यान हटाने की भरपूर कोशिश की।
मैं भारत सरकार के इस वक्तव्य को याद दिलाना चाहता हूँ कि कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार विकसित देश अपनी असफलताओं की भरपाई विकासशील देशों से न करें। लेकिन इसी बात को दोहराते हुए मैं सरकार से कहना चाहता हूँ कि आज वायु प्रदूषण मानव जीवन के लिए संकट बन चुका है। यह आपकी जिम्मेदारी है कि इस मुद्दे का समाधान करें। कुछ लोगों द्वारा लगाए गए नारों को आधार बनाकर आप अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। आपने कॉप30 में जो बातें कहीं—उन्हें अपने ही देश में लागू कीजिए और लोगों को वायु प्रदूषण से मुक्ति दिलाइए। साफ हवा की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों पर अमानवीय करवाई करने वाली पुलिसकर्मियों पर कानूनी करवाई की जाये ।









