सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- सीवर सफाई में होने वाली मौतों में तीन हफ़्तों के भीतर मुआवज़ा दें सरकारें
सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्टूबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि हाथ से मैला ढोने (सीवर सफाई आदि में) से होने वाली मौतों के लिए मुआवज़ा घटना के तीन हफ़्तों के भीतर दे दिया जाए. अदालत ने कहा कि अगर तीन हफ़्तों के भीतर मुआवज़े की राशि नहीं दी गई, तो संबंधित सचिव को अदालत में पेश होना होगा|
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 अक्टूबर) को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि हाथ से मैला ढोने (सीवर सफाई आदि में) से होने वाली मौतों के लिए मुआवज़ा घटना के तीन हफ़्तों के भीतर वितरित किया जाए.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 20 अक्टूबर, 2023 को पारित अपने निर्देशों के कार्यान्वयन की निगरानी के बाद पारित किया. 2023 के निर्देशों के अनुसार, अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए हाथ से मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने के लिए हरसंभव उपाय करना अनिवार्य कर दिया था.
अदालत ने सीवर या नालियों की सफाई के दौरान मरने वालों के परिवार को दी जाने वाली मुआवज़ा राशि को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया था.
लेकिन फैसले में यह उल्लेख नहीं किया गया था कि क्या यह पूर्व में हुई मौतों के लिए भी दिया जाएगा.
बुधवार को अदालत ने कहा, ‘इस अदालत ने मुआवज़े और राशि पर आदेश पारित कर दिया है, लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि 10 लाख रुपये दिए जाएं या 30 लाख रुपये. हमें कोई कारण नहीं दिखता कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कम से कम 10 लाख रुपये का भुगतान क्यों नहीं करना चाहिए.’
अदालत ने कहा कि अगर तीन हफ़्तों के भीतर मुआवज़े की राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो संबंधित सचिव (लोक निर्माण विभाग) को अदालत में पेश होना होगा.
शीर्ष अदालत ने आगे संकेत दिया कि अगर अदालत के फ़ैसले के बाद मृत्यु हुई है, तो संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित राशि का भुगतान करना होगा|
सीवर पीड़ितों की विकलांगता की स्थिति में राज्य/केंद्र शासित प्रदेश को न्यूनतम 10 लाख रुपये का मुआवज़ा भी देना होगा. अगर विकलांगता स्थायी प्रकृति की है, तो देय न्यूनतम मुआवज़ा 20 लाख रुपये निर्धारित किया गया है.
अदालत ने बलराम सिंह द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए. याचिकाकर्ता ने मैनुअल स्कैवेंजर नियोजन एवं शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993 के साथ-साथ मैनुअल स्कैवेंजर नियोजन एवं उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 के प्रावधानों को लागू करने की मांग की.
अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि इन कानूनों के बावजूद इनका क्रियान्वयन कागजों तक ही सीमित रहा. इसने केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने और निगमों, रेलवे, छावनी और अपने नियंत्रण वाली एजेंसियों सहित सभी वैधानिक निकायों को निर्देश जारी करने का निर्देश दिया ताकि चरणबद्ध तरीके से सीवरों की मैनुअल सफाई पूरी तरह से समाप्त हो सके.
अदालत ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई करते समय कम से कम 347 लोगों की मौत हुई है.
मालूम हो कि देश में पहली बार 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था. इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से बैन लगाया गया. हालांकि आज भी समाज में मैला ढोने की प्रथा मौजूद है.
मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है. अगर किसी विषम परिस्थिति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए 27 तरह के नियमों का पालन करना होता है. हालांकि इन नियमों के लगातार उल्लंघन के चलते आए दिन सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की जान जाती है|
सौजन्य :द वायर
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