सुप्रीम कोर्ट ने अदालत के बाहर मैनुअल सीवर सफाई के लिए पीडब्ल्यूडी पर जुर्माना लगाया
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग पर मैनुअल सीवर सफ़ाई के ख़िलाफ़ अपने आदेशों का उल्लंघन करने पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. इस मामले में अदालत परिसर के बाहर मज़दूरों, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है, को बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर साफ़ करते पाया गया था|
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (18 सितंबर) को दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) पर मैनुअल सीवर सफ़ाई के ख़िलाफ़ अपने आदेशों का उल्लंघन करने पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. अदालत परिसर के बाहर मज़दूरों, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है, को बिना सुरक्षा उपकरणों के नालियां साफ़ करते पाया गया था.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने अक्टूबर 2023 में जारी अपने निर्देशों का उल्लंघन करने पर लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को फटकार लगाई.
अदालत ने कहा, ‘इस तरह के काम के लिए जुर्माना लगाना उचित होगा, जैसा कि इस आवेदन के साथ संलग्न तस्वीरों से पता चलता है. इसलिए, हम पीडब्ल्यूडी को चार हफ़्तों के भीतर राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग में 5 लाख रुपये जमा करने का निर्देश देते हैं.’
पीठ ने आगे चेतावनी दी कि न केवल पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों को, बल्कि अन्य अधिकारियों को भी ‘नींद से जागने’ की ज़रूरत है ताकि उसके निर्देशों का ‘अक्षरशः’ पालन सुनिश्चित किया जा सके.
पीटीआई के अनुसार, शीर्ष अदालत के गेट एफ के बाहर बिना सुरक्षा उपकरण के मजदूरों को नालियों की सफाई के लिए लगाया गया था.
घोर अवहेलना
अदालत में न्यायमित्र के रूप में सहायक वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने दलील दी कि यह घटना बाध्यकारी निर्देशों की घोर अवहेलना दर्शाती है. उन्होंने बताया कि वीडियो फुटेज में खतरनाक काम के लिए तैनात लोगों में एक नाबालिग भी दिखाई दे रहा है.
उन्होंने कहा, ‘नाबालिग को इस काम में लगाया गया था और यह वीडियो में स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड किया गया है. तिलक मार्ग थाने में पुलिस शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की गई, लेकिन न तो पुलिस और न ही लोक निर्माण विभाग ने उचित कार्रवाई की. यह केवल श्रम कानून का उल्लंघन नहीं है, बल्कि संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन है.’
अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उसके पहले के निर्देश दोषी अधिकारियों तक ‘नहीं पहुंचे’ या ‘जानबूझकर उनकी अनदेखी की गई.’ अदालत ने आगे कहा कि उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में, अदालत संबंधित अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देगी.
अदालत ने कहा, ‘इस समय हम ऐसा करने से इसलिए परहेज कर रहे हैं क्योंकि कोई दुर्घटना नहीं हुई है और यह सुनिश्चित करना है कि न तो अधिकारी और न ही उनके द्वारा नियुक्त ठेकेदार किसी भी कर्मचारी को बिना सुरक्षा उपकरणों के नाले या सीवर में प्रवेश करने दें.’
अदालत हाथ से मैला ढोने की जारी प्रथा पर प्रकाश डालने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी|
बता दें कि इस साल 29 जनवरी सुप्रीम कोर्ट ने देश में हाथ से मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) के उन्मूलन में अस्पष्टता को लेकर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए छह महानगरों में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित किया था.
मालूम हो कि बीते जुलाई महीने में केंद्र ने बताया था कि देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक सफ़ाई की जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा कराए गए एक सामाजिक ऑडिट के अनुसार, सीवर सफ़ाई के दौरान मरने वाले 90% से ज़्यादा मज़दूरों के पास कोई सुरक्षा उपकरण या व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट नहीं थे
जिन मामलों में उनके पास कुछ सुरक्षा उपकरण थे भी, वे सिर्फ़ एक जोड़ी दस्तानों और गमबूट तक ही सीमित थे|
ज्ञात हो कि देश में पहली बार 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था. इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से बैन लगाया गया. हालांकि आज भी समाज में मैला ढोने की प्रथा मौजूद है.
मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है. अगर किसी विषम परिस्थिति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए 27 तरह के नियमों का पालन करना होता है. हालांकि इन नियमों के लगातार उल्लंघन के चलते आए दिन सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की जान जाती है|
सौजन्य :द वायर
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