वाराणसी: सच और संवेदना का उत्सव : वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजय विनीत को ‘नव दलित सम्मान’
वाराणसी। परंपरा और परिवर्तन की धरती काशी ने बुधवार को एक ऐसा दिन जिया जो लंबे समय तक स्मृतियों में दर्ज रहेगा। शहर के बीचों-बीच स्थित पराड़कर भवन, जो हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा बाबू पराड़कर की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है, 20 अगस्त 2025 को समाज, साहित्य और संवेदना के साझा जश्न का केंद्र बन गया। यहां जन मित्र न्यास (Jan Mitra Nyas) और पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स (PVCHR) द्वारा आयोजित वार्षिक सम्मान समारोह, “सच और संवेदना का उत्सव”-ने एक साधारण कार्यक्रम की सीमाओं को लांघ कर एक लोक उत्सव का रूप ले लिया।
सुबह 11.30 बजे जैसे ही कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, पराड़कर भवन का विशाल सभागार लोगों से खचाखच भर गया। पत्रकार, लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, शिक्षाविद, छात्र और आम नागरिक-सभी वर्गों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि यह आयोजन केवल पुरस्कार वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के भीतर जीवित संवेदनाओं की पुनर्पुष्टि है। तालियों की गड़गड़ाहट, कविताओं की गूंज, भावनाओं से भीगे शब्द और सम्मानित हस्तियों की आभा-इन सबने मिलकर एक ऐसा वातावरण रचा, जिसने हर उपस्थित व्यक्ति को गहराई से प्रभावित किया। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया, जब चर्चित पत्रकार और मानवाधिकार योद्धा विजय विनीत को इस वर्ष का सर्वोच्च “नव-दलित सम्मान” (Neo Dalit Samman) प्रदान किया गया। सम्मान की घोषणा होते ही पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। यह सम्मान केवल किसी व्यक्ति विशेष को दिया गया पुरस्कार नहीं था, बल्कि उस पत्रकारिता को दिया गया सामूहिक नमन था, जिसने हमेशा समाज के सबसे हाशिए पर खड़े लोगों को आवाज़ दी। चंदौली के एक छोटे-से गाँव से निकलकर विजय विनीत ने पत्रकारिता की यात्रा की शुरुआत की। यह सफ़र लखनऊ, बरेली, मेरठ और वाराणसी जैसे बड़े केंद्रों से होते हुए आगे बढ़ा। ‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’, ‘हिन्दुस्तान’ और ‘जनसंदेश टाइम्स’ जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों में काम करते हुए उन्होंने पत्रकारिता के सबसे कठिन मोर्चों पर अपनी कलम चलाई। बरेली-बदायूं के दंगे हों, तराई क्षेत्र का आतंकवाद, या बनारस के ओंकारेश्वर मंदिर पर हमला-हर बार विजय विनीत ने साबित किया कि पत्रकारिता केवल ख़बर छापने का काम नहीं है, बल्कि यह साहस, प्रतिबद्धता और समाज के प्रति गहरी ज़िम्मेदारी का नाम है। उनकी सबसे चर्चित रिपोर्ट वह थी, जिसमें उन्होंने चंदौली के कुबराडीह गांव में भूख से हुई एक दलित परिवार की मौत की खबर छापी। यह रिपोर्ट संसद तक गूंजी और सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। सत्ता तंत्र हिल गया और भूख व कुपोषण की वास्तविकता पर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई। कार्यक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण क्षण था-व्योमेश शुक्ल को जन मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया जाना। कवि, आलोचक और रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल समकालीन हिंदी साहित्य की एक बहुआयामी प्रतिभा हैं। उनकी कविताएं आज के समय की बेचैनी और आशा दोनों को स्वर देती हैं। आलोचक के रूप में उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक ऐसा सेतु बनाया, जिससे हिंदी आलोचना नई दिशा में आगे बढ़ी। रंगमंच पर उनका योगदान भी उतना ही उल्लेखनीय है। उनकी प्रस्तुतियों में समाज और संवाद एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। यही कारण है कि उन्हें केवल कवि या नाटककार कहना पर्याप्त नहीं होगा। वे उस परंपरा के ध्वजवाहक हैं, जहां साहित्य और समाज एक-दूसरे के लिए सांस लेते हैं। समारोह में उन हस्तियों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने मैदान में उतरकर मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ी। पिंटू गुप्ता ने गांव-कस्बों में जमीनी स्तर पर मानवाधिकारों की अलख जगाई। वे उन आवाज़ों में से हैं, जो अक्सर अख़बारों की सुर्खियों तक नहीं पहुंचतीं, लेकिन जिनकी मेहनत से बदलाव की नींव पड़ती है। अधिवक्ता कुमार सिंह कमलेन्द्र ने अदालत को उत्पीड़ित वर्गों का मंच बनाया। उन्होंने साबित किया कि कानून केवल किताबों में नहीं, बल्कि न्याय दिलाने का असली हथियार बन सकता है। चे ग्वेरा रघुवंशी ने अपने नाम की तरह संघर्ष और क्रांति की गूंज को समाज और अदालत दोनों जगह बुलंद किया। उनके वक्तव्य ने उपस्थित लोगों को रोमांचित कर दिया। समारोह में एक भावुक क्षण तब आया, जब मंच से स्वर्गीय अनिल चौधरी को श्रद्धांजलि दी गई। उनकी स्मृति में पुस्तकों का विमोचन किया गया। इसके बाद testimonial therapy (गवाही) का सत्र हुआ, जिसने पूरे सभागार को भावुक कर दिया। पीड़ित लोगों की गवाहियों ने यह अहसास कराया कि समाज में संवेदना और संघर्ष का रिश्ता कितना गहरा है। वक्ताओं ने कहा कि अनिल चौधरी ने सामाजिक संघर्ष को अपने जीवन का आधार बनाया और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे। पूरे आयोजन में बार-बार यह महसूस हुआ कि यह केवल पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक समाजिक घोषणा-पत्र है। मंच पर आए वक्ताओं ने कहा, “विजय विनीत अपनी निर्भीक पत्रकारिता से और व्योमेश शुक्ल अपनी गहन कविताओं से साबित करते हैं कि शब्द कभी मरते नहीं। वे समय के सबसे अंधेरे दौर में भी रास्ता दिखाते हैं।” पत्रकारों ने इसे लोकतंत्र की मजबूती का उत्सव बताया, वहीं साहित्यकारों ने इसे संवेदना और शब्दों के पुनर्जागरण का क्षण माना। यह भी उल्लेखनीय रहा कि आयोजन स्थल—पराड़कर भवन का चुनाव प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था। यही भवन हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा बाबू पराड़कर की स्मृतियों से जुड़ा है। इस भवन में खड़े होकर हर पत्रकार और साहित्यकार ने यह महसूस किया कि वे एक ऐसी परंपरा का हिस्सा हैं, जिसने देश की आज़ादी से लेकर आज तक समाज के संघर्षों को दर्ज किया है। 20 अगस्त 2025 का दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि समाज के इतिहास में दर्ज एक ऐसा क्षण है, जिसने यह साबित कर दिया कि परिवर्तन सत्ता से नहीं, समाज की कलम और कर्म से आता है। विजय विनीत की निर्भीक रिपोर्टिंग, व्योमेश शुक्ल की गहरी कविताएं, पिंटू गुप्ता और कमलेन्द्र जैसे कार्यकर्ताओं की लड़ाई, चे ग्वेरा रघुवंशी की आवाज़, और अनिल चौधरी की स्मृतियां-ये सब मिलकर यह संदेश देते हैं कि सच और संवेदना जब साथ आते हैं तो बदलाव अवश्य होता है। यह आयोजन वाराणसी की उस पहचान को और गहरा कर गया, जो परंपरा और आधुनिकता दोनों को साथ लेकर चलती है। इस दिन ने यह स्पष्ट कर दिया कि पत्रकारिता, साहित्य और मानवाधिकार केवल अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि वे मिलकर एक जन-आंदोलन रचते हैं। और यही था,“सच और संवेदना का उत्सव”-एक ऐसा उत्सव, जो आने वाले वर्षों तक समाज को प्रेरित करता रहेगा।
सौजन्य :पूर्वांचल न्यूज़
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