*यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स पर संवाद: एक वैकल्पिक कक्षा
31 जनवरी 2026 को संवाद ने लखनऊ विश्वविद्यालय के संविधान स्थल पर यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स पर एक अध्ययन चक्र का आयोजन किया। यह अध्ययन चक्र किसी औपचारिक अकादमिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में आयोजित किया गया था।
– शांतम सहाय , लखनऊ
विश्वविद्यालय परिसरों में इन रेगुलेशन्स को लेकर बढ़ती शत्रुता, भ्रम और ध्रुवीकरण के बीच यह स्पष्ट था कि छात्रों के पास न तो ठहरकर सोचने की जगह है और न ही एक दूसरे की बात सुनने की। ऐसे समय में संवाद ने एक ऐसा मंच बनाने का प्रयास किया, जहां छात्र बिना भय और दबाव के अपने विचार रख सकें और एक दूसरे से सीख सकें।
इस अध्ययन चक्र में स्नातक, परास्नातक और पीएचडी स्तर के छात्रों ने भाग लिया। विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमियों और सामाजिक अनुभवों के बावजूद चर्चा की एक साझा गंभीरता दिखाई दी। बातचीत न तो भावनात्मक उबाल तक सीमित रही और न ही नारेबाजी तक। छात्रों ने रेगुलेशन्स को ध्यान से पढ़ा, उनके प्रावधानों को समझा और उनके भीतर मौजूद संभावनाओं तथा सीमाओं दोनों पर ईमानदारी से विचार किया।
चर्चा के दौरान रेगुलेशन्स के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से बात हुई। भेदभाव की परिभाषा पर विशेष ध्यान दिया गया और यह समझने की कोशिश की गई कि भेदभाव को व्यक्तिगत घटना के बजाय संस्थागत समस्या के रूप में देखना क्यों जरूरी है। रेगुलेशन्स द्वारा प्रस्तावित संस्थागत ढांचे पर भी गंभीर बहस हुई, खासकर प्रतिनिधित्व, स्वायत्तता और शिकायत निवारण से जुड़े निकायों में शक्ति के केंद्रीकरण के प्रश्न पर। छात्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि इन रेगुलेशन्स को केवल प्रशासनिक दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक संघर्षों और मौजूदा राजनीतिक अंतर्विरोधों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
इस अध्ययन चक्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष था दृष्टिकोण का सवाल। यह प्रश्न लगातार सामने आया कि भेदभाव को देखने और परिभाषित करने का अधिकार किसके पास है। हाशिये पर खड़े छात्रों ने अपने अनुभव साझा किए, जिनसे यह स्पष्ट हुआ कि जातिगत और लैंगिक भेदभाव अक्सर बहुत सूक्ष्म रूपों में सामने आता है। यह कक्षा में व्यवहार, मूल्यांकन की प्रक्रियाओं, मार्गदर्शन तक पहुंच और अनौपचारिक सत्ता संरचनाओं में दिखाई देता है। इन अनुभवों ने यह बात रेखांकित की कि जब तक हाशिये पर मौजूद लोगों के अनुभवों को केंद्र में नहीं रखा जाता, समानता की कोई भी चर्चा अधूरी रहती है।
चर्चा के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स के खिलाफ जो तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, वह केवल प्रक्रियात्मक या प्रशासनिक चिंताओं का परिणाम नहीं है। असल असहजता उस प्रतीकात्मक स्वीकृति से पैदा हुई है जो ये रेगुलेशन्स भेदभाव के अस्तित्व को लेकर करती हैं। ये नियम सत्ता का कोई मौलिक पुनर्वितरण नहीं करते, फिर भी वे उन विशेषाधिकारों को असहज करते हैं जो अब तक बिना जवाबदेही के चलते आए हैं। यही असहजता विरोध और आक्रोश के रूप में सामने आई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस अध्ययन चक्र ने वैकल्पिक कक्षाओं की जरूरत को रेखांकित किया। आज के समय में शिक्षा और शिक्षण पद्धति को लगातार खोखला किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों को इस तरह पुनर्गठित किया जा रहा है कि वे सत्ताधारी व्यवस्था के हितों के अनुरूप ढल जाएं। आलोचनात्मक सोच, नैतिक विवेक और संवाद की जगह धीरे धीरे खत्म की जा रही है। ऐसे माहौल में संवाद जैसी पहलें छात्रों के भीतर तर्कशीलता और संवेदनशीलता की स्वायत्तता को जीवित रखने का काम करती हैं।
यह अध्ययन चक्र इस बात की याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक शिक्षा ऊपर से दी गई कोई सुविधा नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसे अभ्यास, संवाद और संघर्ष के माध्यम से नीचे से निर्मित करना पड़ता है। संवाद ने इस अध्ययन चक्र के माध्यम से इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।









