मजदूरों का कार्यस्थल बनता कत्लगाह
बिहार हमेशा से मजदूरों का ‘निर्यातक’ राज्य रहा है, गुलाम भारत में भी और आज़ाद भारत में भी। देश के भीतर ही नहीं, विदेशों तक बिहार के मजदूर जाकर अपनी मज़दूरी बेचते रहे हैं।
सुनील कुमार
आज मिडिल ईस्ट में बिहार के मजदूरों की संख्या काफ़ी बड़ी हो चुकी है। भारत के भीतर होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में भी मरने वाले मजदूरों में बड़ी संख्या बिहार से आने वालों की होती है। यही कारण है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पलायन एक बड़ा मुद्दा बना और सरकार ने घोषणा की कि वह बिहार से हो रहे पलायन को रोकेगी।
कर्ज़ का फंदा और मौत की यात्रा
22 जनवरी को छत्तीसगढ़ के बलौदा बाज़ार ज़िले स्थित रियल इस्पात प्लांट में हुए विस्फोट में 6 मजदूरों की मौत और 5 के घायल होने की खबर आई। मरने वाले सभी बिहार के गया ज़िले के डुमरिया प्रखंड स्थित गोटीबांध गांव के निवासी थे और महादलित समुदाय (मांझी) से आते थे। मरने वालों में एक पिता और उसका बेटा भी शामिल है। ये सभी लोग अपने परिवार के लिए दो वक़्त की रोटी जुटाने के वास्ते सिर्फ़ दस दिन पहले छत्तीसगढ़ के बलौदा बाज़ार के बकुलाही स्थित रियल इस्पात एंड स्टील संयंत्र में काम करने गए थे, जहाँ पहले से उनके गांव के कुछ लोग काम कर रहे थे।
इन सभी लोगों पर 30 से 50 हज़ार रुपये तक का कर्ज़ था। किसी ने गांव के साहूकार से कर्ज़ लिया था, तो किसी ने समूह से। गांव में कोई काम नहीं था, कर्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा था और गांव में रहना उनके लिए मुश्किल हो गया था। किसी की बेटी की शादी थी, किसी की पत्नी प्रसव पीड़ा में थी और किसी के पास इन सबके लिए पैसे नहीं थे। कर्ज़ के इस जाल में फँसकर वे सूदखोरों और दलालों के चंगुल में फँसते चले गए।

काम का उत्पादन कम न हो, इसलिए मशीनों को बंद किए बिना ही इन मजदूरों को काम पर भेजा गया, जहाँ तापमान लगभग 900 डिग्री के आसपास होता है। यानी किसी भी हादसे में बचने की कोई गुंजाइश नहीं होती। यही कारण है कि 40 वर्षीय सुंदर भुइयां, 40 वर्षीय विनय भुइयां, 42 वर्षीय बदरी भुइयां, 37 वर्षीय जितेंद्र भुइयां, 22 वर्षीय रामदेव कुमार और श्रवण कुमार की मौत घटनास्थल पर ही हो गई। उनके शव इस कदर झुलस चुके थे कि पहचान करना तक मुश्किल हो गया।
यह हादसा नहीं, यह वह व्यवस्था है जो मुनाफ़े के लिए ज़िंदगियाँ जलाती है, और उसी आग को ‘विकास’ और ‘जीडीपी ग्रोथ’ के जश्न में बदल देती है। वही जीडीपी, जिसके बारे में हम रोज़ चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। यह अर्थव्यवस्था इन्हीं मजदूरों की लाशों पर खड़ी की जा रही है, जो कर्ज़ के जाल में फँसकर अपना श्रम बेचते हैं और धन्नासेठों की तिजोरियाँ भरते हैं।
एक-दो मजदूरों की मौत तो ख़बर भी नहीं बन पाती, न ही उनके आंकड़े सरकार के पास होते हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में मरने वालों की असली संख्या कभी सामने नहीं आ पाती। घायलों का हाल तो और भी बुरा है। इसी घटनाओं में घायल मजदूर- मोताज अंसारी (26), कारपेंटर; सराफत अंसारी (32), कारपेंटर; साबिर अंसारी (37), कारपेंटर; काल्पू भुइयां (51), हेल्पर; और रामू भुइयां (34), हेल्पर की हालत के बारे में भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही है।
मृतकों के परिजनों की जुबानी
“पापा ने समूह से कर्ज़ लिया था। हर महीने 17 हज़ार की किश्त देनी पड़ती थी। किश्त नहीं दे पा रहे थे, कर्ज़ बढ़ता जा रहा था। लोन चुकाने का इतना दबाव था कि पापा को गांव छोड़कर बाहर जाना ही पड़ा। हमें लगता था कि पापा कमाकर कर्ज़ चुका देंगे, फिर हमारे साथ आकर रहेंगे। लेकिन सब कुछ खत्म हो गया।” – खुशबू कुमारी (18), मृतक सुंदर भुइयां की बेटी “बदरी भुइयां कभी गांव से बाहर कमाने नहीं गए थे। पूरे घर की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। भतीजी की शादी करनी थी। कहकर गए थे कि इस बार बाहर से कमा कर लौटेंगे तो शादी करेंगे। लेकिन अब सब खत्म हो गया।” -परतनिया, मृतक की बेटी
“पापा ने बड़ी बहन की शादी के लिए कर्ज़ लिया था। कर्ज़ वाले रोज़ दबाव बनाते थे। कुछ दिन पहले ही पापा गांव के लोगों के साथ कमाने गए थे। अब हम चार बहनों की देखभाल कौन करेगा?” -अस्मिता, मृतक विनय मांझी की बेटी “गांव में कोई काम नहीं था, इसलिए भाई कमाने गए थे। पत्नी की डिलीवरी होनी थी, जिसके लिए उन्होंने कर्ज़ लिया था।” -कांति कुमारी, मृतक जितेंद्र कुमार की बहन गोटीबांध की महिलाओं ने दैनिक भास्कर के रिपोर्टर से कहा, “अगर हमारे गांव या आसपास ही फैक्ट्री होती, तो हमारे पति बाहर जाकर क्यों मरते? गांव में तो पीने का साफ पानी तक नहीं है। पानी के लिए भी दूसरों के दरवाज़े जाना पड़ता है। किसी के पास 10
कट्ठा ज़मीन भी नहीं है।”
इसी तरह 30 जून 2025 को तेलंगाना के संगारेड्डी में सिगाची इंडस्ट्रीज़ विस्फोट में मारे गए डब्लू पासवान के पिता रामनाथ ने कहा था, “अगर बिहार में रोज़गार होता तो गांव के लोगों को तेलंगाना नहीं जाना पड़ता और वे हादसे का शिकार नहीं होते। पेट पालने के लिए दूसरे प्रदेशों की खाक छाननी पड़ती है।” इस घटना के बाद बिहार सरकार ने तीन सदस्यीय कमेटी भेजी थी, लेकिन उस कमेटी की रिपोर्ट का क्या हुआ? मजदूरों के लिए कौन-सी योजनाएँ बनीं? इसका कोई जवाब आज तक नहीं मिला।
यह एक व्यवस्था है जो हादसे के रूप में सामने आता है, यह व्यवस्था मुनाफ़े के लिए ज़िंदगियाँ जलाती है और उसे विकास कहती है। यह भारत की मेहनतकश जनता के शोषण की चरम परिणति है, जो शहरों से लेकर गांवों तक फैल चुकी है और पूरे समाज को अपने खूनी पंजों में जकड़ चुकी है।
सरकारी फाइलों में दर्ज मौतें
छत्तीसगढ़ सरकार ने विधानसभा में बताया कि 1 जनवरी 2024 से 31 जनवरी 2025 तक औद्योगिक इकाइयों में हुई 171 दुर्घटनाओं में 124 श्रमिकों की मौत हुई और 86 घायल हुए। केंद्र सरकार ने जुलाई 2024 में लोकसभा में बताया कि 2018 में 1154, 2019 में 1127, 2020 में 1050, 2021 में 988 और 2022 में 1017 लोगों की जान गई। इसी अवधि में घायल लोगों की संख्या 4528, 3927, 2832, 2803, 2714 रही।

लेकिन ये सारे आंकड़े सिर्फ़ पंजीकृत कंपनियों के हैं। असंगठित क्षेत्र का कोई भरोसेमंद डेटा मौजूद ही नहीं है, जहाँ देश के लगभग 90 प्रतिशत मजदूर काम करते हैं। अगर वह संख्या सामने आ जाए, तो तस्वीर और भी भयावह होगी। दिल्ली जैसे शहरों में, जहाँ हेल्पर की न्यूनतम मज़दूरी लगभग 19,846 रुपये है, वहीं 6 से 10 हज़ार में काम कराया जाता है, सरकार की आँखों के सामने, बिना किसी सुरक्षा के।
समाचार पत्रों में देखें तो 2020 के बाद औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में दुर्घटनाएँ बढ़ी हैं, लेकिन सरकारी आँकड़ों में यह संख्या घटती दिखाई जाती है। 2012 से 2022 के बीच क्रमशः 1317, 1312, 1266, 1107, 1189, 1084, 1154, 1127, 1050, 988 और 1017 मजदूरों की मौत दर्ज की गई। इसी अवधि में घायलों की संख्या में जो गिरावट दिखाई जाती है, वह और भी संदिग्ध है। 2012 में जहाँ घायलों की संख्या 28,700 बताई गई थी, वहीं 2022 में इसे घटाकर सिर्फ़ 2714 दिखाया गया। 2015 में 20,257 से यह संख्या अचानक 2016 में 5367 कर दी जाती है और उसके बाद लगातार और कम बताई जाती है, जबकि मृतकों की संख्या में कोई समानुपातिक कमी नहीं आती।
(स्रोत : Data: An Average of 1000 People Died in Accidents in Factories Between 2012 & 2022 – FACTLY )
यह इस बात की ओर इशारा करता है कि आँकड़े न तो पारदर्शी हैं और न ही ईमानदार। सरकार औपचारिक क्षेत्र की दुर्घटनाओं को भी ठीक से दर्ज नहीं कर रही है और सच्चाई को काग़ज़ों में दबा देना चाहती है। जब मुनाफ़ा ही विकास का पैमाना बन जाए, तो मज़दूर की जान एक “खर्च” बन जाती है। इसी कारण फाइलों में मौतें घटती दिखती हैं, जबकि ज़मीन पर लाशें बढ़ती जाती हैं।
मजदूरों पर कुठाराघात
इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्फेडरेशन के अनुसार, 2020 में मजदूरों के अधिकारों के मामले में भारत दुनिया के 10 सबसे खराब देशों में शामिल था। आईएलओ के मुताबिक भारत औद्योगिक दुर्घटनाओं के मामले में दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक है। 2018 से 2020 के बीच 3,331 मौतें दर्ज हुईं, लेकिन फैक्ट्री एक्ट 1948 के तहत उसी अवधि में सिर्फ़ 14 लोगों को जेल हुई।
आज श्रम क़ानूनों में बदलाव कर मजदूरों की हालत को और कमजोर कर दिया गया है। श्रम कोड में निरीक्षकों (इंस्पेक्टर) को अब निरीक्षक, निरीक्षक नहीं रहे वे मालिकों के ‘फैसिलिटेटर’ बना दिए गए हैं। वे बिना मालिक की अनुमति के अचानक निरीक्षण नहीं कर सकते, न ही तुरंत मुकदमा दर्ज कर सकते हैं। यह आईएलओ कन्वेंशन की भावना के खिलाफ है। आठ घंटे काम के अधिकार को भी कमजोर कर दिया गया है और फैक्ट्री की परिभाषा बदलकर लाखों छोटे उत्पादन केंद्रों को क़ानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है। पहले से न्यूनतम मजदूरी से आधे पर काम कर रहे मजदूरों को मालिकों के रहमों करम पर छोड़ दिया गया है। स्थायी नौकरी की जगह हायर एंड फायर (जब चाहो रखो, जब चाहो निकाल दो) की नीति।
मजदूरों के कार्यस्थल आज सचमुच कत्लगाह बनते जा रहे हैं। इन सब पर पर्दा डालने के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों- धरना, प्रदर्शन, यूनियन बनाने का अधिकार, लिखने-बोलने की आज़ादी पर लगातार हमले हो रहे हैं। मजदूरों की मौत के बाद मुआवज़े के नाम पर कुछ टुकड़े फेंक कर असंतोष की आग को दबाने की कोशिश की जाती है, लेकिन इंसाफ़ मुआवज़े से नहीं, संगठित राजनीतिक संघर्ष से मिलेगा। मजदूर वर्ग को सुरक्षित, सम्मानजनक और संरक्षित कार्यस्थल को अपना मौलिक अधिकार के रूप में हासिल करने के लिए मुनाफाखोरी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करना होगा तभी हम अपना और अपने भविष्य को बचा पाएँगे। जब तक विकास का मतलब मुनाफ़ा और मज़दूर का मतलब ईंधन रहेगा, तब तक येकत्लगाह चलते रहेंगे।









