‘जय भीम’ के सर्जक
हर समुदाय के लोग जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो अभिवादन करते हैं। ऐसा ही एक सम्मानजनक अभिवादन दलितों के पास भी होना चाहिए, इसी विचार से ‘जय भीम’ के नारे का सृजन करने वाले एल. एन. हरदास (‘बाबू हरदास’) का आज जन्मदिन है। आज से 90 साल पहले, 1935 में उन्होंने पहली बार ‘जय भीम’ का नारा बुलंद किया था। उनका मात्र 35 वर्ष का अल्प जीवन अत्यंत प्रभावशाली रहा।
बाबू हरदास का जन्म 6 जनवरी, 1904 को महाराष्ट्र के नागपुर के पास कामठी में हुआ था। उस दौर में दलितों के लिए मैट्रिक तक पढ़ना लोहे के चने चबाने जैसा था, लेकिन कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने मैट्रिक पास की। इस उपलब्धि के कारण लोग उन्हें ‘बाबू’ के नाम से पुकारने लगे।
वे खुद पढ़कर शांत नहीं बैठे। दलित समुदाय के कई युवा और बच्चे दिन में बीड़ी उद्योग में मजदूरी करते थे, जिस कारण वे स्कूल नहीं जा पाते थे। उन्हें पढ़ाने के लिए 1927 में उन्होंने कामठी के बैल बाजार, कंसारी बाजार और नया बाजार जैसे इलाकों में रात्रि पाठशालाएं शुरू कीं। इन स्कूलों में 86 लड़के और 22 लड़कियां पढ़ती थीं, जो एक क्रांतिकारी शुरुआत थी। उन्होंने न केवल प्राथमिक शिक्षा बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर भी जोर दिया। उन्होंने कामठी में एक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी स्थापित किया। उनका मानना था कि अंग्रेजी का ज्ञान दलितों को वैश्विक स्तर पर और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में आगे बढ़ने में मदद करेगा। पठन-पाठन और ज्ञान के प्रसार के लिए उन्होंने कामठी में ‘संत चोखामेला पुस्तकालय’ (Sant Chokhamela Library) की स्थापना की।
इसके अलावा, महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने नागपुर में व्यावसायिक प्रशिक्षण देने वाला ‘महिला आश्रम’ शुरू किया। उन्होंने बीड़ी मजदूरों के शोषण के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी।
दलित युवाओं को संगठित करने और समाज को अंधविश्वास से मुक्त करने के लिए 2 जनवरी, 1924 को दलित अधिकारों के मुखपत्र के रूप में उन्होंने ‘महारठ्ठा’ नामक साप्ताहिक भी शुरू किया। इसके माध्यम से वे दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों तक डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के विचार पहुंचाते थे।
बाबू हरदास डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ (ILP) के सचिव थे और 1937 में नागपुर-कामठी निर्वाचन क्षेत्र से विधायक के रूप में चुने गए थे।
उन्होंने 1933 में दलित युवाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए नागपुर में पहली बार डॉ. अंबेडकर की जयंती (BIRTH DAY) सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत की थी।
बाबू हरदास डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित ‘मूकनायक’ से प्रभावित थे और 1928 में उन्हें डॉ. अंबेडकर से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर मिला। इस मुलाकात ने उन्हें एक नई दिशा दी। डॉ. अंबेडकर के आग्रह पर बाबू हरदास ने 1928 में साइमन कमीशन के समक्ष दलितों के पक्ष में गवाही दी।
1930-31 में जब लंदन में गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुआ, तब बाबू हरदास ने डॉ. अंबेडकर के समर्थन में एक बड़ा अभियान चलाया। उन्होंने और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड को 32 टेलीग्राम भेजकर बताया कि डॉ. अंबेडकर ही दलितों के असली नेता हैं। 1932 में पूना पैक्ट (पुणे समझौते) के समय बाबू हरदास डॉ. अंबेडकर के साथ थे और उन्होंने हस्ताक्षर किए थे।
12 जनवरी, 1939 को मात्र 35 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका ‘जय भीम’ का नारा पूरी दुनिया में फैल गया।
साभार : राजेश कुमार की फस बुक वाल से









