भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने का ढोल खूब पीटा जा रहा है। इस अर्थव्यवस्था को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने वाली मेहनतकश आबादी—खासकर मजदूर-किसान—कहाँ खड़े हैं, इसकी बात नहीं होती। ढोल की आवाज़ उस समय और करकश लगने लगती है, जब […]
भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने का ढोल खूब पीटा जा रहा है। इस अर्थव्यवस्था को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने वाली मेहनतकश आबादी—खासकर मजदूर-किसान—कहाँ खड़े हैं, इसकी बात नहीं होती। ढोल की आवाज़ उस समय और करकश लगने लगती है, जब […]
बाज़ार कमज़ोरी का फ़ायदा उठाते हैं और सरकार शराब पर टैक्स लगाती है, जबकि पीने वाले की निंदा करती है। “मैं कोई बिगड़ी हुई नहीं हूँ,” वह हमेशा कहती है। लेकिन अपूर्वा को नहीं पता था कि उस लेबल को […]
31 जनवरी 2026 को संवाद ने लखनऊ विश्वविद्यालय के संविधान स्थल पर यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स पर एक अध्ययन चक्र का आयोजन किया। यह अध्ययन चक्र किसी औपचारिक अकादमिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ […]
दक्षायनी वेलायुधन भारत की संविधान सभा में एकमात्र दलित महिला थीं, जिन्होंने निडर होकर जातिगत अन्याय और असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जस्टिस न्यूज दक्षायनी वेलायुधन: वह निडर दलित महिला जिसने भारत के संविधान को आकार दिया और समानता की […]
बिहार हमेशा से मजदूरों का ‘निर्यातक’ राज्य रहा है, गुलाम भारत में भी और आज़ाद भारत में भी। देश के भीतर ही नहीं, विदेशों तक बिहार के मजदूर जाकर अपनी मज़दूरी बेचते रहे हैं। सुनील कुमार आज मिडिल ईस्ट में बिहार के […]
“मुझे लगता है कि समस्या यह है कि अमेरिका में बहुत से लोग सोचते हैं कि नस्लवाद एक रवैया है। और यह पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। इसलिए वे सोचते हैं कि लोग जो सोचते हैं वह उन्हें […]
यह लेख समकालीन भारत में हिंदुत्व–कॉरपोरेट गठजोड़ के उदय और सुदृढ़ीकरण तथा लोकतांत्रिक राजनीति, शासन और राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों की पड़ताल करता है। – एस आर दारापुरी, पूर्व आई.पी.एस. लेख का तर्क है कि बहुसंख्यकवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संकेंद्रित कॉरपोरेट पूँजी (वैश्विक वित्तीय पूंजी) के बीच […]
मीरा कुमार एक राजनेता और 15वीं लोकसभा की स्पीकर हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति के क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी है। जस्टिस न्यूज जब आप जिस ज़मीन पर खड़े हैं, वह हमेशा से ही असमान रही हो, तो छत तोड़ने का […]
आज से डेढ़ सौ साल पहले जब जाति व्यवस्था चरम पर थी, वर्ण व्यवस्था के हिसाब से काम होता था महिलाओं को शिक्षा से दूर रखा जाता था खासकर दलित आदिवासी पिछड़े समाज की महिलाओं को शिक्षा प्रतिबंधित था l […]
हर समुदाय के लोग जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो अभिवादन करते हैं। ऐसा ही एक सम्मानजनक अभिवादन दलितों के पास भी होना चाहिए, इसी विचार से ‘जय भीम’ के नारे का सृजन करने वाले एल. एन. हरदास (‘बाबू हरदास’) […]
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