मुलभूत सुविधाओं से वंचित हैं रांगा गांव के दलित

मुंगेर। मुफस्सिल थाना क्षेत्र का रांगा गांव रास्ता विवाद को लेकर सुर्खियों में है। रविवार को रास्ता विवाद में पथराव और मारपीट की घटना घटी।

मुंगेर। मुफस्सिल थाना क्षेत्र का रांगा गांव रास्ता विवाद को लेकर सुर्खियों में है। रविवार को रास्ता विवाद में पथराव और मारपीट की घटना घटी। इस घटना के बाद राजनीति भी जोरों पर है। खुद को दलित हितैषी साबित करने की होड़ में कुछ नेताओं ने पूरे मामले को तूल देना भी शुरू कर दिया। घटना को लेकर ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है- जैसे रांगा गांव के लोगों के लिए विवादित रास्ता ही सबसे बड़ा सवाल है। लेकिन, गांव पहुंचने के बाद तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आने लगता है। दलित और महादलित के नाम पर राजनीति खूब होती है। लेकिन, रांगा गांव के दलित अब भी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। घनी आबादी वाले इलाके में न तो शौचालय है और न विद्यालय। गांव के लोगों की कई पीढि़यां सरकार से मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं को पाने की आस में गुजर गई। गांव तक सीधा सड़क संपर्क के लिए विवादित रास्ता के अलावे भी ग्रामीणों के पास दो विकल्प हैं। प्रशासनिक स्तर पर पहल हों, तो रास्ते की समस्या पलक झपकते सुलझ जाएगी।

रांगा गांव की महादलित महिला लीला देवी ने कहा कि हमलोगों की कई पुश्तों ने यहां अपने दिन गुजारे हैं। कई सरकारें आई और चली गई। लेकिन यहां के हालात में आज तक कोई सुधार नहीं हुआ। न तो यहां पीने के लिए पानी की उचित व्यवस्था है । न किसी रहनुमा, न किसी राजनेता ने ही हमारी परेशानियों को देखने की कोशिश की है। स्थानीय प्रतिनिधि भी सिर्फ अपनी राजनीति करने के समय हमारी जरूरत महसूस करते हैं। गांव में तीन हजार की आबादी है। मगर इतने लोगों की प्यास बुझाने के लिए सिर्फ एक समरसेबुल लगाया गया था। कुछ दिन पूर्व ग्रामीणों के कहने पर पानी की असुविधा को दूर करने के लिए तीन और समरसेबुल लगाया तो गया, मगर आज तक हमारे घरों में इसका कनेक्शन नहीं हो पाया। पानी को संग्रहित करने के लिए पानी की टंकी नहीं बनाई गई।

स्थानीय ग्रामीण शोभा देवी ने कहा कि सरकार खुले में शौच को रोकने के लिए घर घर शौचालय बनवाने की योजना चला रही है। मगर हमारा गांव आज तक इस योजना के लिए तरस रहा है। अगर सरकार या स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाले कोशिश करें तो हमारी बहु बेटियों को खुले में शौच जाने से मुक्ति मिल जाएगी।

उषा देवी ने कहा कि हम दलित और महादलित समुदाय के लोगों को सिर्फ मोहरा बनाया जाता है। कुछ लोग हमारा विकास नहीं होने देने के लिए हर संभव कोशिश करते रहते हैं। इस महादलित गांव में न तो सामुदायिक भवन है, न ही रोजी रोजगार के लिए कोई उपाय किए गए हैं। हमारे पास न तो राशन कार्ड है, ना ही रोजगार की सुविधा। किसी प्रकार से हम अपने बच्चों का भरण पोषण करते हैं। सरकार को हमारे लिए रोजगार के अवसर पैदा करने के बारे में ध्यान देना चाहिए। जिससे हमारी पारिवारिक परेशानियां भी समाप्त हो जाए।

महादलित समुदाय के जयनारायण पासवान ने कहा तीन हजार की आबादी वाले गांव में वृद्धा पेंशन की सुविधा कुछ लोगों को ही मिली है। मगर आज भी कई ऐसे वृद्ध हैं, जिनको वृद्धा पेंशन नहीं मिल पाया है। कई बार यहां के अधिकारियों से लेकर राजनीतिक दलों के लोगों से गुहार लगाई गई। मगर हम लोगों को मिलने वाली वृद्धा पेंशन की सुविधा का कोई निदान नहीं निकल पाया।

रंजीत पासवान कहते हैं सरकार महादलितों के बारे में घोषणाएं करती हैं। बच्चों को अच्छी और उच्च शिक्षा के प्रयास करने की जानकारी सुनने को मिलती हैं। लेकिन हमारे गांव में आज तक स्कूल नहीं बन पाया। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। महादलितों की तीन हजार की आबादी वाले इस इलाके में मुश्किल से 50 युवक होंगे जो थोड़े पढ़े लिखे हैं।

बब्लू पासवान ने कहा कि यह गांव मुख्य आबादी से काफी दूर बसा है। हमारे पास शहर की ओर जाने के लिए रास्ते की परेशानी है। सरकार प्रत्येक गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने की बात करती है, तो रंगा गांव को भी सड़क से जोड़ा जाना चाहिए। लोगों को इंदिरा आवास, सामुदायिक भवन, शौचालय, बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए विद्यालय की जरूरत है। अगर सरकार ध्यान दे तो हमारा भी उद्धार हो जाएगा।

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